gahri jaden

Anwar Suhail
Anwar Suhailemployed en coal india limited

हिंदी कहानी संग्रह (भारतीय मुस्लिम परिवेश की ग्यारह कहानियां) प्रकाशक : यथार्थ प्रकाशन, दिल्ली

गहर जड़: कथा सं ह: अनवर सुहैल
अनु म णका:
1. नीला हाथी
2. यारह सत बर के बाद
3. गहर जड़े
4. चह लुम
5. दहशतगद
6. पुरानी र सी
7. नसीबन
8. पी ह जाम उफ हज़रतजी
9. कुं जड़-कसाई
10. फ ते भाई
1 नीला हाथी
क पनी के काम से मुझे बलासपुर जाना था।
मेरे फोरमेन खेलावन ने बताया क य द आप बाई-रोड जा रहे ह तो कटघोरा के पास एक थान है
वहां ज र जाएं। मेन रोड से एक कलोमीटर पहले बाई तरफ जो सड़क नकल है, उस पर बस
मुि कल से दो कलोमीटर पर एक मजार है।
वह मजार तो मुसलमान का है ले कन वहां एक ह दू अह र को पीर बाबा क सवार आती है। ये
सवार आती है शु वार को, इस लए येक शु वार वहां मेला सा लगता है। अह र पर पीर बाबा
सवार होते ह और लोग क िज ासाओं का जवाब देते ह।
मने खेलावन फोरमेन से कहा-’’अपने देश क यह तो वशेषता है, नेता जात-पात के नाम पर लोग
को भड़काते ह और जनता है क देखो कै से घुल - मल है।’’
खेलावन फोरमेन मेर बात सुन कर खुश हुआ, बोला-’’साहब, पछल दफा म वहां गया तो जानते ह
बड़ा चम कार हुआ। जैसे ह म वहां पहुंचा, अह र पर पीर बाबा क सवार आई हुई थी। भीड़ बहुत
थी। मने सोचा क इतनी भीड़ म दशन न हो पाएगा। ले कन तभी पीर बाबा क सवार बोल क
देखो तो कोतमा से कौन आया है? लोग ने एक-दूसरे क तरफ देखना शु कया तब मने बाबा को
बताया क बाबा म हूं खेलावन, कोतमा से आया हूं। तब पीर बाबा ने मुझे अपने पास बुलाया और
भभू त मेरे गाल पर मल द । मजार के बाहर जो अगरबि तयां जलती ह उनक राख क भभू त ह
बाबा का साद होता है साहब। बताईए, ह न थान क म हमा!’’
मने उसे बताया क स भव हुआ तो ज र वहां जाऊं गा।
मुझे वैसे भी मजार म बड़ी च है। इस लए नह ं क मुझे मजार म ा है, बि क इस लए क वहां
आ था, बाजार और अंध व वास के नए-नए प देखने को मलते ह। ये मजार न होते तो न होतीं
इलायची दाना, रेवड़ी क दुकान। ये मजार न होते तो चादर , फू ल और त बीह-मालाओं का कारोबार
न चलता। ये मजार न होते तो कै सेट, इ , अगरबि तय के उ योग का या होता? ये मजार न होते
तो क वा लये बेकार हो गए होते? ये मजार न होते तो ालु इतनी गैर-ज र या ाएं न करते और
बस-रेल म भीड़ न होती। ये मजार न होते तो लड़का पैदा करने क इ छाएं दम तोड़ जातीं। ये
मजार न होते तो जादू-टोने जैसे छु पे दु मन से आदमी कै से लड़ता? ये मजार न होते तो
खदमतगार , भखा रय , चोर और बटमार को अ डा न मलता?
शायद इसी लए मुझे मजारात म च है।
कटघोरा वाल मजार के बारे म जानकर लगा क चलो देखा जाए य क कटघोरा म मेरा बचपन
गुजरा है। इसी बहाने पुरानी याद ताजा हो जाएंगी।
खेलावन फोरमेन ने मुझे रा ते क बार कयां समझाइं क कहां तक प क रोड है और कतनी दूर
तक क ची सड़क है। मने सभी ववरण डायर म नोट कर लया।
मेरे अ बू कटघोरा के हायर सेक डर कू ल म पढ़ाते थे। मने वहां म डल कू ल तक क श ा पाई
थी। फर अ बू का तबादला खर सया हो गया। मने रायपुर इंजी नय रंग कॉलेज से मेके नकल
इंजी नय रंग क और कोयला खदान म इंजी नयर बन गया। मोशन पाते-पाते सुप रटे डट इंजी नयर
हो गया हूं।
कटघोरा म चूं क हम सरकार आवास म रहते थे, इस लए वहां फर जाना हो नह ं पाया था। अ बू ने
रटायरमट के बाद रायपुर म मकान बना लया सो कटघोरा से उनका भी कोई लंक न रहा।
अपनी कार से म कटघोरा के पास पहुंचा तो खेलावन फोरमैन क बात याद हो आई। मने सोचा क
पहले कटघोरा बस टड पहुंच कर चाय पी जाए फर आगे क सोची जाएगी। वैसे भी बस- टड ह
कटघोरा का दय- थल है। वहां क चहल-पहल से पुरानी याद ताजा ह गी। बचपन म दो त के साथ
हम बस- टड आते थे। म बस- टड क कताब क दुकान से पराग और नंदन जैसी बाल-प काएं
खर दा करता था।
सरकार आवास भी आगे सड़क के कनारे थे।
हमारा वाटर सबसे कनारे था।
अ मी को बागवानी का “◌ा◌ौक था इस लए वाटर के बगल म और पीछे नाले तक अ बू ने तार से
घेरा बनवा दया था। कू ल का चपरासी अ मी क बागवानी म मदद कया करता था। अ मी उस
छोटे से कचन-गाडन म लहसुन, ह द , पपीता, अम द और के ला लगवाया करती थीं। साग, ध नया
और पुद ना भी होता। गुलाब, लल और सेवंती क या रयां देखने लायक हुआ करती थीं।
स दय के दन थे।
कटघोरा बस- टड म काफ भीड़-भाड़ थी। लोग धूप तापते हुए बस का इंतजार कर रहे थे। कु छ बस
आ रह थीं, कु छ जा रह थीं। कोने क चाय गुमट के पास मने कार रोक और एक कड़क चाय कम
चीनी क बनाने का आडर दया। पता नह ं य मुझे अ छे होटल म बैठ कर चाय पीने म मजा
य नह ं आता? मुझे इसी तरह गुम टय म चाय पीना बहुत अ छा लगता है। दुकानदार ने खास
तव जो द और त परता से एक कड़क चाय बनाकर पेश क ।
चाय क चुि कय के बीच म माहौल का जायजा लेने लगा।
बस- टड पहले से काफ भरा-पूरा हो गया है। इतनी दुकान पहले कहां थीं? र े क जगह ऑटो ने ले
ल है। कई क प नय के मोबाईल टॉवर दखलाई पड़ रहे ह। चाय पीकर मने सगरेट सुलगाई और
कताब क दुकान जा पहुंचा। वहां अब एक लड़का बैठा हुआ था। प काओं पर एक नगाह डालते हुए
मने पूछा-’’हंस है?’’
लड़का मोबाईल का ईयरफोन कान म ठूंसे कोई गीत सुन रहा था। मेरा न सुनकर जोर से बोला-
’’नह ं, बकता नह ं। इं डया-टुडे ले ल िजए।’’
मने देखा क वहां ‘वय क के लए’ “◌ा◌ीशक लए कई रंग- बरंगी प काएं द शत थीं। एक तरफ
बाबा रामदेव क कताब और हनुमान चाल सा, गीता आ द अ य धा मक कताब थीं।
मने सगरेट ख म क और कार टाट कर अपने उस वाटर क तरफ कार मोड़ द जहां मेरे बचपन
के दन गुजरे थे।
मेन रोड के कनारे हमारा आवास अब ख डहर म त द ल हो चुका था। लगता है क अब सरकार ने
नई जगह कॉलोनी बना ल है। आवास से लगा नाला अब दखलाई नह ं देता। वहां कई अवैध मकान
क पौध उग आई है। तेजी से फै लते “◌ाहर करण का नमूना देख मेरा दल भर आया।
मने कार वापस बलासपुर जाने वाल सड़क क तरफ मोड़ द ।
मुझे मजार भी जाना था।
तग डे पर आकर बलासपुर जाने वाल सड़क पर कार दौड़ रह थी। खेलावन फोरमैन ने बताया था
क तग डे से लगभग एक कलोमीटर बाद बाई तरफ एक सड़क कटती है। उस पर एक कलोमीटर
जाना है और वह ं मजार है।
मने इ मीनान से कार चलाते हुए मजार तक का सफर तय कया।
देखा क एक गु बदनुमा इमारत तैयार हो रह है।
हरे रंग का गु बद दूर से दखता है।
दन के बारह बज रहे थे।
मजार के आस-पास आठ-दस दुकान थीं, िजनम चादर, फू ल और “◌ा◌ीरनी बेची जाती है। मने कार
एक कनारे खड़ी क , जेब से माल नकाल कर सर पर बांध लया और एक दुकान के सामने जा
खड़ा हुआ। इस बीच कई दुकानदार ने मुझे अपनी ओर आवाज देकर बुलाना चाहा। मने कहा-’’कोई
एक जगह ह जा पाउंगा भाई!’’
दुकानदार एक दुबला-पतला वृ था, िजसने हरे रंग का कु ता और सर पर हरे रंग क टोपी पहन रखी
थी।
उसने मुझे सलाम कया और कहा-’’जूते उतार कर अंदर चले जाइए, वजू बना ल िजए।’’
मने जूते उतारे और अंदर चला गया।
वहां एक कोने म नल लगा था और बैठकर वजू बनाने क यव था थी।
वजू बनाकर मने दुकानदार से कहा-’’इं यावन पए क चादर और “◌ा◌ीरनी का जुगाड़ बना द।’’
दुकानदार ने लाि टक क ड लया म एक हरे और लाल रंग क चादर रखी, इ , अगरब ती और रेवड़ी
का पैके ट रखा। ड लया मने बड़ी ा से सर पर उठाई और मजार क तरफ चल पड़ा।
कई भखार मेर ओर लपके ।
उनसे बचते-बुचाते गु बदनुमा मजार के अंदर म वेश कर गया।
इससे पहले म िजस मजार “◌ार फ म गया तो एक आ याि मक “◌ा◌ा◌ं त का अनुभू त पाया था
ले कन उस मजार म मुझे ऐसा एकदम नह ं लगा क कसी हानी जगह म दा ख़ल हो रहा हूं।
हरा गु बद सर पर सजाए वह एक बड़ा सा चैकोर कमरा था। सुनहरे रंग के बाडर वाला एक
खुशनुमा दरवाजा, िजसके बाहर दोन तरफ लोग बैठे हुए थे। सुनहरे दरवाजे पर अरबी म कलमा
लखा हुआ था।
‘लाइलाहा इ ल लाह, मुह मदुरसूलु लाह’
मने बडे अदब से दरवाजे क चैखट का एक हाथ से बोसा लया और ड लया स भाले मजार के अंदर
दा खल हुआ।
मने मन ह मन मजार को सलाम कया-’’अ सलामो अलैकु म या अहले कु बूर!’’
फर मने अंदर का जाएजा लया। वहां मने देखा क हरा चोगा पहने एक आदमी मजार क तरफ
मुंह कए कु छ बुदबुदा रहा है। उसक पीठ मेर तरफ थी। “◌ा◌ायद वह फा तहा पढ़ रहा था।
म हरे चोगे वाले आदमी के सामने जा पहुंचा और बना उसके चेहरे क तरफ देखे ड लया बढ़ाई,
ता क पहले मजार “◌ार फ का बोसा ले लूं।
ड लया पकड़ाकर मने हरे चोगे
़
वाले आदमी के चेहरे क तरफ देखा, मुझे “◌ा ल कु छ पहचानी सी
लगी।
अचानक मेरे जेहन म अपने साथ म डल तक के पढ़े क लू उफ कल म मुह मद क त वीर उभर
आई।
मने देखा क हरे चोगे
़
वाला आदमी भी मुझे इस नजर से देख रहा है जैसे वह अतीत के चल च म
कु छ खोज रहा हो।
म मु कु राया।
हरे चोगे वाला आदमी का चेहरा मेर मु कान देख अचानक भावह न हो गया। उसने चुपचाप ड लया
ल । यं वत ड लया म से हर चादर नकाल और चादर मजार पर चढ़ाने लगा। मने भी चादर का
एक कोना पकड़ कर चादर-पोशी म ह सा लया। फर उसने ड लया म से “◌ा◌ीरनी का पैकट
नकाला, एक कोना फाड़ा और मजार के कनारे उसे रखा। इ क “◌ा◌ीशी खोल इ को चादर पर
छ ंट दया और आंख बंद कर फा तहा पढ़ने लगा। मने भी फा तहा वानी के लए हाथ उठा लए।
हरे चोगे
़
वाला आदमी अब मुझे अ छ तरह पहचान म आ गया।
वह क लू ह था।
मने चेहरे पर हाथ फे रते हुए मजार क प र मा क और दान-पेट म एक सौ पए का नोट डाला तो
देखा क हरे चोगे वाला आदमी मुझे देख रहा है।
मने मजार क कदमबोसी क और हरे चोगे वाले के पास पहुंचा।
उसने मोरपंख के झाड़ू मेर पीठ पर फे र और मेरे कान के पास मुंह लाकर बुदबुदाया-’’जाइएगा नह ं,
कु छ बात करनी है।’’
मने हामी भर और “◌ा◌ीरनी लेकर मजार से बाहर नकल आया।
तब तक जाने कहां से कु छ क वाल आ गए थे। मै◌े क वाल के पास बैठ गया और क वाल का
लु फ उठाने लगा।
‘भर दे झोल मेर या मुह मद
लौट कर म न जाउंगा खाल ’
म क वाल के बोल सुनते हुए हरे चोगे वाले मुजाबर यानी क लू उफ कल म मोह मद व द
मोह मद सल म आ तशबाज क याद म खो गया।
इतवार का दन था। सुबह के आठ बजे ह गे।
तालाब सुनसान ह था। गांव के लोग और पशुओं के आने का अभी समय नह ं हुआ था।
बारह वश य न हा क लू नडर होकर उकड़ू बैठा खुरपी से म ी खोद रहा था। वह काम के धुन म
मगन था। वह ं छपाक् छपाक् मढक पानी और कनारे वाला कोई खेल खेलने म मशगूल थे, रह
अपनी बला से, न हे क लू क त ा इन छपाक् से भंग होने वाल नह ं है। उसने उस म ी का
ठकाना जान लया है िजससे वह कै से भी आकार बना सकता था।
जब क लू न हा सा ब चा था तब वह अपनी अ मी को रसोई म परेशान कया करता था। वह
जमाना गैस का नह ं था। लकड़ी से जलने वाला म ी का दोमुंहा चू हा जलता और उसक लाल आंच
म खाना पकाती अ मी क आकृ त क लू को कसी पर सी लगती थी। लकड़ी क धीमी आंच म
दाल पकती और रो टयां संकतीं। क लू दोन तरफ कड़क संक रोट खाया करता था। तीन बहन के
बाद उसक आमद हुई थी सो क लू का घर म बड़ा मान था। बहन भी उसे यार कया करती थीं।
अ मी आटा गूंधना “◌ा◌ु करतीं क क लू उनके पास जा पहुंचता और बोलता-’लोई से च ड़या
बना दो न अ मी!’ या क ‘चूहा बना दो न अ मी!’
अ मी ब चे क िज़द को पूरा करती और थोड़े सा आटा लेकर क लू के लए च ड़या या चूहा बना
देती। उसके बाद क लू उस आटे के खलौने से खेलता।
कु छ देर बाद क लू आटे के खलौन को पुन ल दे क “◌ा ल दे देता और अपनी क पना-शि त से
आम, के ला या आदमी का मुंह बनाता। धीरे-धीरे वह हाथी बनाना सीख गया। हाथी बनाकर वह उसे
चू हे के अंगार म पकाता और फर याह से रंग कर देता। फर दो त को दखाता-’’देखो देखो,
नीला हाथी!’’
वह जब भी अपने न नहाल जाता तो नानी के घर के पास रहने वाले कु हार के काम को घ ट
नहारा करता था। वह कु हार को म ी बनाने क तैयार करते देखता। वाकई बेदाग मुलायम चकनी
म ी को घड़ा आ द बनाने के लए तैयार करना काफ मसा य काय था। जब गूंथी हुई म ी का
ल दा घूमते चाक पर चढ़ता और कु हार के जादुई पश से घड़े क “◌ा ल म, या सुराह म बदलता
तो न हा क लू अचं भत खड़ा देखता रहता। उसके आ चय का ठकाना न रहता।
वह थोड़ा बड़ा हुआ तो काल मं दर के पास बसे बंगाल कलाकार के पास जाने लगा। वहां गणेश
भगवान, दुगा मां, काल मां, सर वती, रा स और “◌ोर आ द क मू तयां बनते देखा करता। कस तरह
कलाकार खपि चय का ढांचा खड़ा करते ह। फर पुआल और सुतल क सहायता से व भ न आकार
बनाते ह क ऐसा आभाश होता जैसे आदमी या जानवर के कं काल खड़े ह । कं काल म म ी का लेप
चढ़ता तो बना सर क मू तयां बन जातीं। ी “◌ार र, पु श “◌ार र और जानवर के बना सर के
िज म। कलाकार के पास मुंह के अलग-अलग सांचे हुआ करते। कसी सांचे म देवी दुगा का मुंह बन
जाता, कसी सांचे से भगवान राम क मुखाकृ त। कसी सांचे से गणेश भगवान का चेहरा बनता और
कसी सांचे से रा स के भयानक मुंह। “◌ोर, मोर, चूहा, सांड के मुंह के सांचे भी यथावसर उपयोग
कए जाते।
क लू के इस मू त ेम ने उसके जीवन म हलचल मचाई थी।
वह बहुत बाद क बात है।
पाठशाला म ह त श प क पर ा के समय म ी के खलौने बना कर जमा करना होता था। क लू
के खलौने सभी खलौन से अलग होते। वह म ी से सीताफल ऐसा बनाता क असल का म
होता। हां, उसके पास रंग न होते और वह याह से उसे रंगता। हरा क जगह नीला सीताफल।
श क उसे ह त श प म पूरे न बर दया करते। म ी के के ले बनाता तो उसम पसी ह द घोलकर
रंग भरता। फर कहता क ये पके के ले ह।
क लू कू ल म होने वाले गणेशो सव के लए इस बार वयं गणप त क मू त बनाने के लए परेशान
था। कू ल के तवार मा साब उसे ो सा हत कर रहे थे क इस बार मू त वह बनाए।
बारह वश य क लू उफ कल म मोह मद आ मज मोह मद सल म आ तशबाज ने बड़ी लगन से
गणप त ब पा क दो ब ते क मू र्त बनाई।
इसी लए क लू सुबह-सुबह तालाब के कनारे बैठा म ी इक ा कर रहा था। वह म ी कू ल ले जाता।
वहां ाउ ड के कनारे ाचाय के ऑ फस के पीछे उसने अपना कायशाला बनाई थी। क लू ने सोचा
क दो दन के अंदर मू त तैयार करेगा। तवार मा साब ने क लू क मदद के लए “◌ा◌ंकर
चपरासी के लगाया था। “◌ा◌ंकर ने क लू के लए खि चयां, पुआल और सुतल क यव था कर द
थी। हां, गणप त ब पा के मुंह के लए सांचा तो था नह ं। न हे क लू ने बना सांचे के गणेश
भगवान का चेहरा बनाने का नणय लया था। “◌ा◌ंकर ने एक कै ले डर ला दया था िजसम गणप त
क मनमोहक मु ा थी। क लू ने बड़ी त मयता से मू त नमाण का काय अंजाम दया। “◌ा◌ंकर के
कहने पर क लू त दन नहा कर आता ता क मू त नमाण म प व ता बरकरार रहे। उसने
खपि चय का ढांचा खड़ा कया। फर पुआल और सुतल क सहायता से गणेश जी का आकार
बनाया। धीरे-धीरे उसने पुआल पर म ी चढ़ाई और बना सांचे क सहायता से गणेश भगवान क
ऐसी तमा बनाई क देखने वाले देखते रह जाएं।
तवार मा साब बोलते-’अ ुत तभा है बालक म। मां सर वती का वरदान मला है इसे। देखो तो
कतनी जीव त तमा बना द है इसने।’
वाकई हम ब च को बड़ा अजीब लगता क कै से हमारा एक हमउ इतनी सफाई और लगन से मू त
नमाण के काय को अंजाम दे रहा है।
तवार मा साब ने “◌ा◌ंकर से क लू के लए रंग क पु ड़या मंगवा द ।
मू त सूखी तो क लू ने रंग का लेप चढ़ाया।
तवार मा साब ने मू त का ृंगार-आभूशण आ द मंगा दया, कै ले डर को देख-देख क लू ने गणेश
भगवान क मू त का ऐसा ृंगार कया क जो देखे दंग रह जाए।
उसने मू त के पास रखने के लए एक छोटा सा चूहा भी बनाया, गणप त ब पा क सवार मूशक।
फर एक त ती पर उसने बड़ी टाईल से लखा-
व तु ड महाकाय सूयको ट सम भा
न व नं कु मे देव, सवकायशु सवदा
तवार मा साब ने व यालय म उसी मू त क थापना क और पूजन कया।
यह बात उड़ते-उड़ते मुसलमान क ब ती म भी पहुंची।
हम ब च को तो खास मतलब न था, ले कन सुनते ह क क लू के इस मू त नमाण ने उसके
जीवन म कई त द लयां लाइं। क लू के अ बू मोह मद सल म आ तशबाज क जमकर मज मत क
गई। उनसे कहा गया क क लू को मि जद लाकर उससे सामू हक प से माफ मंगवाई जाए और
तौबा करवाई जाए।
सल म आ तशबाज बड़े अकड़ू क म के इंसान थे। थे भी पूरे सवा छ फु ट के कद के आदमी। कहते
थे क ह दु तानी मुसलमान तो ह नह ं, उनके पूवज इराक से आए थे। वह वयं को इराक कहा
करते थे और नगर के मुसलमान को नीची नजर से देखते थे। कहते थे क हुजूर ने कहा है क हक-
हलाल क कमाई खाओ, म मेहनत करता हूं। आ तशबाजी का हुनर मुझे मेरे पूवज से मला है,
इस लए इसम लोग को एतराज य होता है? म कोई याज के पैसे खाता नह ं, हरामकार करता नह ं
फर मुझसे लोग चढ़ते य ह?
बेटे क लू के कारण हुई इस फजीहत से वह बेहद दुखी रहने लगे थे।
उ ह ने कह दया था क उ ह चाहे समाज से हटा दया जाए, ले कन ब चे से वह माफ मंगवाने का
काम नह ं करगे। क लू के अ बू ने क लू क पटाई क और उससे कहा क वह भगवान या देवी-
देवता क मू त बनाना छोड़ दे।
क लू मार खाता रहा और मन ह मन ण करता रहा क वह मू त बनाने का “◌ा◌ौक पूरा करता
रहेगा। इस मू तकला के हुनर के कारण ह तो उसक कू ल म इ जत है, “◌ा◌ोहरत है और इसी से
गु जन खुश रहते ह।
मने देखा था क उस घटना के बाद से क लू उदास रहने लगा था।
क लू के प रवार का सु नी मुि लम कमेट ने ब ह कार कर दया।
अब उ ह कोई अपने दुख-सुख म बुलाता न था।
इसी दर मयान क लू के अ बू मृ यु हो गई।
क लू यतीम हो गया।
क लू क अ मी ने सु नी मुि लम कमेट के सदर, से े टर और अ य पदा धका रय के आगे दुखड़ा
रोया तब कह ं जाकर कमेट ने नणय लया क चूं क मरहूम मोह मद सल म आ तशबाज कलमागो
मुसलमान था, जुमा और ईद-बकर द क नमाज अदा करता था, मि जद के लए जो भी चंदा मुकरर
कया जाता, वह अदा कया करता था, इस लए उसके कफन-दफन और जनाजे क नमाज म कमेट
को “◌ा◌ा मल होना चा हए।
और इस तरह मरहूम आ तशबाज मोह मद सल म क मैयत म लोग इक ा हुए और कफ़न-दफन
हुआ। कु रआन- वानी हुई। दसवां-चह लुम क फातेहा हुई।
गर बी क मार से क लू पढ़ाई छू ट गई।
क लू क अ मी चूं क आ तशबाजी के काम म हाथ बंटाती थी,सो उसने क लू से कहा क अ बू का
धंधा िज दा रखा जाए। क लू को तो मू तकला से लगाव था। उसने बेमन से आ तशबाजी के काम
को जार रखा और साथ ह मू तकला के हुनर म जी जान से जुट गया।
हम कभी बलासपुर जाने वाल सड़क क तरफ जाते तो बंगाल मू तकार के यहां क लू को काम
करता पाते।
फर मेरे अ बू का कटघोरा से थाना तरण हो गया और उस जगह से हमारा स पक खतम हो गया।
क वाल गा रहे थे-
‘जमाने मे कहां टूट हुई त वीर बनती है
तेरे दरबार म बगड़ी हुई तकद र बनती है’
सुनने वाले दस-बीस पए के नोट क वाल क हारमो नयम पर रखते जाते। क वाल हाथ के इशारे से
उ ह आदाब कहता और फर पए क तरफ देखते हुए तान खींचता।
तभी मने देखा क क लू उफ कल म हरा चोगे म मजार से बाहर आया।
उसने मुझे इशारा कया और म उठ कर उसके पीछे हो लया।
हम मजार के पीछे क तरफ आए।
यहां एक तरफ बड़े से चू हे म लंगर बन रहा था।
चू हे क आंच से बचते हम एक कोठर म घुसे।
यहां जमीन पर सफे द ग ा बछा था और गाव-त कए कर ने से रखे हुए थे। क लू बैठ गया और मुझे
बैठने का इशारा कया।
म उसके नजद क बैठ गया।
मने मु कु राकर उससे पूछा-’’ये कै सा प ले लया भाई?’’
क लू के माथे पर चंता क लक र थीं-’’ या करता। इन कठमु ल को सबक सखाने का इसके
अलावा मेरे पास कोई रा ता नह ं था।’’
‘‘कै से?’’ मेर उ सुकता बढ़ने लगी।
‘‘अ बू क मौत के बाद अ मी भी यादा दन िज दा नह ं रह ं। उनक मौत पर फर एक बार कमेट
वाल ने नौटंक क । मेरे गड़ गड़ाने पर वे कफन-दफन को राजी हुए।’’
‘‘तुमने मू त बनाने का काम या तब भी जार रखा?’’
‘‘हां, बंगाल आ ट ट के साथ मने खूब काम कया। बंगाल क बेट से मुझे मुह बत हो गई। बंगाल
उससे मेर “◌ा◌ाद के लए तैयार हो गया। उसने अपनी बेट के धम बदलने के मामले म भी
सहम त दे द । म कमेट वाल के पास गया क मेरा नकाह हो जाए, कमेट वाल ने मेर कोई मदद
न क । वे मुझे ‘का फ़र’ कहने लगे।’’ क लू क आंख भर आई थीं।
म चुपचाप उसक जीवन-गाथा सुन रहा था।
आंख प छ कर उसने बताया-’’मने अ लाह और रसूल को हािज़र-नािज़र मानकर अपना नकाह खुद
कया। मने अपनी बीवी का नाम सायरा रखा। पहले उसका नाम ेया था।’’
उसने मुंह पीछे क तरफ करके आवाज द -’’सायरा!’’
चंद ल हे बाद सलवार-सूट म एक औरत ने परदे के पीछे से झलक दखलाई।
वह एक सांवले चेहरे और बड़ी-बड़ी आंख वाल ी थी।
मने क लू के पसंद क मन ह मन तार फ क ।
क लू ने ी से कहा-’’मेरे बचपन के दो त ह ये!’’
सायरा ने सलाम कया।
मने जवाब दया-’’वा अलैकु म अ सलमाम!’’
क लू ने कहा-’’चाय तो पलाईए इ ह!’’
सायरा चल गई और क लू ने अपने बयान को अंजाम तक पहुंचाया-’’म “◌ा◌ाद के बाद घूमने
नकल गया। मने कई मजार क सैर क । सभी जगह मने पाया क वहां इ लाम क रौशनी नदारत
थी। था सफ और सफ अक दतमंद क भावनाओं से खेल कर पैसे कमाना। म तो सफ मू त
बनाया करता था। उसे पूजता तो न था। ले कन इन जगह पर मने देखा क एक तरह से मू तपूजा
ह तो हो रह है। तभी मेरे दमाग म ये वचार आया क म भी पाख ड करके देखता हूं। लौट कर
जब कटघोरा आया तो मने नगर के बाहर इस थान पर बैठना “◌ा◌ु कया। हरा चोगा धारण कर
लया। भं गय का मुह ला लगा हुआ है। वहां क औरत मेरे पास आने लगीं और ब च क नजर
उतरवाने लगीं। म कु छ नह ं करता। बस अगरब ती क राख उन ब च के गाल पर लगा देता। उ ह
यक न हो जाता और मजे क बात ये है क ब चे ठ क भी हो जाते। उ ह ं लोग ने चंदा इक ा करके
मेरे लए एक कोठर बना द । सायरा मेरे पास आकर रहने लगी। फर मने जुमा क एक “◌ा◌ाम
घोशणा कर द क मुझे रात वाब म पीर बाबा आए और बताया क ब चा इसी जगह मेर मजार
बनाओ। मेर बात जंगल म आग क तरह फै ल और सु नी कमेट वाल ने आनन-फानन चंदा इक ा
करना “◌ा◌ु कर दया।’’
म जहां बैठता था उसी से लगी थी कमेट के सदर क जमीन। उ ह ने सोचा क मजार बनने से
उनक जमीन का रेट बढ़ेगा और उनका रोजगार भी फै लेगा। हुआ वह । जो कमेट मेर दु मन थी,
उसने मुझे मजार का मुजाबर बना दया।’’
मुझे हंसी आ गई-’’और ये ह दू अह र वाल बात!’’
क लू मु कु राया-’’बेरोजगार था अह र, मेरे पास आकर बैठता। गांजा पीता। फर कभी कभी झूमने
लगता। मने कहा क इस पर पीर बाबा क सवार आती है। उसका भी रोजगार चल नकला। इस
तरह यहां अब ह दू और मुसलमान दोन आकर म नत मांगते ह और हमार रोजी-रोट चलती है।’’
2. यारह सत बर के बाद
यारह सत बर के बाद कर मपुरा म एक ह दन ,एक साथ दो बात ऐसी हुइं, िजससे चपकू तवार
जैसे लोग को बतकह का मसाला मल गया।
अ वल तो ये क हनीफ ने अपनी खास मयांकट दाढ़ कटवा ल । दूजा कू प अहमद ने जुटा
दया...जाने उसे या हुआ क वह दंत नपोर छोड़ प का नमाजी बन गया और उसने चकने चेहरे
पर बेतरतीब दाढ़ बढ़ानी “◌ा◌ु कर द ।
दोन ह मुकामी पो ट-आ फस के मुलािजम।
अहमद, एक ग त-◌ा◌ील युवक अनायास ह घनघोर-नमाजी कै से बना?
हनीफ ने दाढ़ य कटवाई?
सन ्’चैरासी के दंग के बाद स ख ने अपने के श य कु तरवाए...
अहमद आज इन सवाल से जूझ रहा है। अहमद क च ताओं को कु मार समझ न पा
रहा था। कल तक तो सब ठ क-ठाक था ।
आज अचानक अहमद को या हो गया?
वे दोन ढाबे पर बैठे चाय क ती ा कर रहे थे।
कु मार उसे समझाना चाह रहा था -’’छोड़ यार अहमद दु नयादार को...बस ‘वेट ए ड वाच’ ...जो होगा
ठ क ह होगा।’’
‘‘वो बात नह ं है यार...कु छ समझ म नह ं आता क या कया जाए?’’---अहमद उसी तरह तनाव म
था ,
‘‘ जाने कब तक हम लोग को वतनपर ती का सबूत देने के लए मजबूर कया जाता रहेगा ।’’
कु मार खामोश ह रहा ।
वे दोनो चतीस-पतीस साल के युवक थे ।
कर मपुरा से दोन एक साथ पो टआ फस काम पर आते ।
आ फस म अ सर लोग उ ह एक साथ देख मजाक करते--’’अख ड भारत क एकता के नमूने...’’
अहमद का दमागी संतुलन गड़बड़ाने लगा।
‘‘अब मुझे लगने लगा है क म इस मु क म एक कराएदार के है सयत से रह रहा हूं, समझे
कु मार...एक करायेदार क तरह...!’’
यह तो बात हुई थी उन दोन के बीच ... फर जाने य अहमद के जीवन म अचानक बदलाव आ
गया?
हनीफ के बारे म अहमद सोचने लगा।
पो ट-आ फस क डाक थै लय को बस- टड तथा रे वे टेशन पहुंचाने वाले र ा- चालक हनीफ। बा-
व त पंचगाना नमाज अदा करना और लोग म बेहद खुलूस के साथ पेश आना उसक पहचान है।
पीर-बाबा क मजार पर हर जुमेरात वह फा तहा-द द पढ़ने जाता है । अहमद को अ सर धा मक
मामलात म वह ◌े सलाह-मश वरा कया करता ।
यक न मा नए क हनीफ एक सीधा-सादा ,नेक-ब त ,द नदार या यूं कह क धम-भी क म का
इंसान है। वह खामखां कसी से मसले-मसायल या क राजनी तक उथल-पुथल पर छड़ी बहस म
कभी ह सा नह ं लेता। हां, अपने ववेक के मुता बक आड़े व त बचाव म एक मशहूर “◌ोर क पहला
मसरा वह अ सर बुदबुदाया करता ---’उनका जो काम है वह अहले सयासत जाने...’
हुआ ये क यारह सत बर के बाद दु नया के समीकरण ऐसे बदले क कोई भी अपने को नरपे
सा बत नह ं कर पा रहा था । सफ दो ह वक प ! अमे रका के आतंक- वरोधी काय म का समथन
या वरोध...बीच का कोई रा ता नह ं । यह तो एक बात हुई । ठ क इसी के साथ दो बात गूंजी क
दु नया म आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले लोग इ लामी धमावलंबी ह,दूसरा यह क इ लाम
आतंकवाद धम नह ं। वह मसाल क ठ डा और गम एक साथ...तक क कोई गुंजाइश नह ं।
बहुत ज दबाजी म ये बात था पत कर द गई क सार दु नया म आतंकवाद के बीज बोने वाले
और संसार को चैदहवीं सद म ले जाने वाले लोग मुसलमान ह ह।
अर बय -अफगा नय क तरह दाढ़ के कारण धोखे म सख पर भी अमर का म अ याचार हुए। बड़े
मासूम होते ह अमर क !
वे मुसलमान और सख म भेद नह ं कर पाते। बड़े अमन-पसंद ह वे । आज उ ह कसी ने ललकारा
है। अमर कय को संसार म कोई भी ललकार नह ं सकता। वे बहुत गु से म ह। इसी लए उनसे
‘ म टेक’ हो सकती है । ‘ म टेक’ पर हनीफ को याद आया...
उदू म मंटो नाम का एक सर फरा कथाकार हुआ है। िजसने दंगाइय क मान सकता पर एक नायाब
कहानी लखी थी। ‘ म टेक हो गया’... िजसम दंगाई धोखे म अपनी ह बरादर के एक यि त का
क ल कर देते ह। अस लयत जानने पर उनम यह संवेदना फू ट --’’ क साला म टेक हो गया...’’
हनीफ ने “◌ा◌ायद इसी लए अपनी दाढ़ कटवा ल हो, क कह ं वह कसी ‘ म टेक’ का शकार न हो
जाए ।
और इस तरह चपकू तवार जैसे लोग को बतकह का मसाला मल गया...
चपकू तवार है भी गु -चीज...’ग पोलोजी’ का ोफे सर...
खूब चुटक लेते ह पो ट-मा टर ीवा तव साहब भी। ह भी रोम के नीरो। अपनी ह धुन म
मगन...चमच क एक बड़ी फौज के मा लक। कर मपुरा इस े काऐसा पो टआ फस, िजसम सालाना
एक-डेढ़ करोड़ क एन.एस.सी. बेची जाती है । बचत-खाता योगदान म िजले क यह सबसे बड़ी
यू नट है । इस औ यौ गक-नगर म पछले कई साल से जमे ह ीवा तव साहब। य द कभी उनका
कह ं तबादला हुआ भी तो एड़ी-चोट का जोर लगाकर आदेश कवा लये। ीवा तव साहब अ सर
कहा करते ---’कर मपुरा बड़ी कामधेनु जगह है...।’
सुबह-सुबह पो टआ फस म चपकू तवार और ीवा तव साहब क म डल ने अहमद का मूड-आफ
कया।
चपकू तवार पहले बी.बी.सी. चैनल कहलाया करता था। ले कन यारह सत बर के बाद वह ‘अल-
जजीरा’ के नाम से पुकारा जाने लगा।
हुआ ये क सुबह जैसे ह अहमद पो ट-आ फस म घुसा, उसे चपकू तवार क आवाज सुनाई द ।
वह भांज रहा था---’’अमे रका म सख के साथ गलत हो रहा है । अमे रकन ससुरे कटुवा और सख
म फक नह ं कर पाते ।’’
फर कसी “◌ाडयं भनक से अहमद के कदम ठठक गए!
वह थोड़ी देर ठहर गया , और क कर उनक बात सुनने लगा।
ीवा तव साहब ने फकरा कसा ---’’चलो जो हुआ ठ क हुआ...अब जाकर इन मयां लोग को अपनी
ट कर का आदमी भटाया है ।’’
‘‘ हां साहब, अब लड़ ये साले मयां और इसाई ... उधर इजराइल म यहूद भी इन मयांओं को चांपे
हुए ह। ‘‘
‘‘ वो हनीफवा वाल बात जो तुम बता रहे थे ?’’--- ीवा तव साहब का न।
अहमद के कान खड़े हुए। तो हनीफ भाई वाल बात यहां भी आ पहुंची ।
--’’ अरे वो हनीफवा... इधर अमे रका ने जैसे ड लेयर कया क लादेन ह उसका असल दु मन
है,हनीफवा ने त काल अपनी दाढ़ बनवा ल । आज वो मुझे सफाचट मला तो मने उसे खूब रगड़ा।
उससे पूछा क ‘का हनीफ भाई, अभी तो पटाखा फू टना चालू हुआ है...बस इतने म घबरा गए?
हनीफवा कु छो जवाब नह ं दे पाया। ‘‘
भगवान दास तार बाबू क गुट- नरपे आवाज सुनाई द ।
‘‘सन चैरासी के दंग के बाद सख ने भी तो अपने के श कतरवा लए थे। जब भार उथल-पुथल हो
तब यह तो होता है ।’’
अपने पीछे कु छ आवाज सुन अहमद द तर म दा खल हुआ।
उसे देख बतकह बंद हुई।
अहमद इसी बात से बड़ा परेशान रहता है। जाने य अपनी खुल बहस म लोग उसे “◌ा◌ा मल
नह ं करते। इसी बात से उसे बड़ी को त होती। इसका सीधा मतलब यह है क लोग उसे गैर
समझते ह।
तभी तो उसे देखकर या तो बात का टा पक बदल दया जाएगा या क गप बंद हो जाएगी। अ सर
उसे देख चपकू तवार इ लामी-तहजीब या धमशा के बारे म उ टे सीधे सवालात पूछने लगता
है।
आजकल क वलंत सम या से उपजे कु छ “◌ा द, िजसे मी डया बार-बार उछालता है, उसम
अमर का, अल-कायदा, ओसामा बन लादेन, अफगान, पा क तान,िजहाद, तथा इ लामी फं डामटा ल म से
जुडे
़
अ य अ फाज ह । इ ह ं “◌ा द क दन-रात जुगाल करता है मी डया।
अहमद से चपकू तवार अपनी तमाम िज ासाएं “◌ा◌ा त कया करता। अहमद जानता है क
उसका इरादा अपनी िज ासा “◌ा◌ा त करना नह ं बि क अहमद को परेशान करना है।
कल ह उसने पूछा था -- ‘‘अहमद भाई ये िज़हाद या होता है ?’’
अहमद उसके सवाल से परेशान हो गया ।
चपकू तवार न उस समय पूछता जब ीवा तव साहब फु सत म रहते ।
ीवा तव साहब उसके न से खूब खुश हुआ करते ।
इधर अहमद इन सवाल से झुंझला जाता ।
वह कहता भी क उसने इ लामी धमशा का गहन अ ययन नह ं कया है। कहां पढ़ाया था म मी
पापा ने उसे मदरसे म । अं ेजी और ह द मा यम से श ा हण क उसने । वह तो पापा क
चलती तो उसका खतना भी न हुआ होता।
बड़े अजीबोगर ब थे पापा।
म मी और मामुओं क पहल पर उसका खतना हुआ।
पापा कतने नाराज हुए थे । वह नह ं चाहते थे क उनका बेटा पर परागत मजहबी बने। वह चाहते
थे क उनका बेटा इ लाम के बारे म वयं जाने और फर ववेकानुसार फे ◌ै◌ेसले करे।
मुि लम प रवेश से अहमद बहुत कम वा कफ था। पापा सरकार महकमे म ‘ए’ लास आफ सर थे
...उनका उठना बैठना सभी कु छ गैर के बीच था। धा मक प से वह ईद -बकर द भर म स य
रहते थे । कारण क वभागीय आला अफसरान और चहेते मातहत के लए दावत आ द क यव था
करनी पड़ती थी। ‘ े स’ भी ऐसे क ईद-बकर द आ द के साथ वे अनजाने म मुहरम क भी
मुबारकबाद दे दया करते। उ ह ये भी पता न होता क मुहरम एक गम का मौका होता है।
म मी को पापा क ये आजाद- याल फू ट आंख न भाती । म मी उ ह समझाया करतीं। पापा हंस
देते---’’आ खर व त म या ख़्◌ा◌ाक मुसलमां ह गे ।’’
वाकई वे मरने को मर गए क तु ईद-बकर द के अलावा कसी तीसर नमाज के लए उ ह समय
मलना था ,न मला। उस हसाब से अहमद कु छ ठ क था। वह जुमा क नमाज अव य अदा कया
करता । म मी क टोका-टाक के बाद धीरे-धीरे उसने अपनी िज दगी म यह आदत डाल । नकाह के
बाद कु लसूम क खु शय के लए अ वल-आ खर रोजा भी अब वह रखने लगा था।
अहमद के पापा एक आजाद याल मुसलमान थे । वह अ सर अ लामा इकबाल का एक मशहूर
“◌ोर दुहराया करते ---’’ कौम या है कौम क इमामत या है।
इसे या जाने ये दो रकअ़त के इमाम !’’
चूं क म मी एक प के मजहबी घराने से ता लुक रखती थीं, इस लए पापा क दाल न गल पाती ।
कहते ह क दादा-जान को पापा के बारे म इ म था क उनका ये बेटा मजहबी नह ं है। इस लए
बहुत सोच वचार कर वे एक मजहबी घराने से बहू लाए थे, ता क खानदान म इ लामी पर पराएं
जी वत बची रह । अहमद के पापा वक ल थे । वह एक कामयाब वक ल थे । काफ धन कमाया
उ ह ने। कहते भी थे क अगर कह ं ज नत है तो वह झूठ के लए नह ं। इस लए वहां क ऐ-◌ा◌ो-
इ-◌ारत क या लालच पाल। सारे वक ल संगी-साथी तो वहां जह नुम म मल ह जाएंगे। अ छ
क पनी रहेगी।
इस दल ल के साथ वह एक जोरदार ठहाका लगाया करते।
एक सड़क हादसे म उनका इंतेकाल हुआ था। तब अहमद नातक तर क पढ़ाई कर रहा था ।
छ न- भ न हो गई थी िज़ दगी...। उस बुरे व त म मामुओं ने म मी और अहमद को स भाल
लया था ।
ऐसे वतं वचार वाले पता का पु था अहमद और उसे चपकू तवार वगैरा एक कठमु ला
मुसलमान मान कर सताना चाहते ।
इसी लए अ सर अहमद का दमाग खराब रहा करता।
वह कु मार से कहा भी करता--’’ कु मार भाई , म या क ं ? तुमने देखा ह है क मेर कोई भी अदा
ऐसी नह ं क लोग मुझे एक मुसलमान समझ । तुमम और मुझम कोई अ तर कर सकता है ? म न
तो दाढ़ ह रखता हूं और न ह दन-रात नमाज ह पढ़ा करता हूं। तुमने देखा होगा क मने कभी
सरकार अथवा ह दुओं को कोसा नह ं क इस मु क म मुसलमान के साथ अ याय कया जा रहा
है। जब क उ टे मने यह पाया क मुसलमान क बदहाल का कारण उनक अ श ा और
द कयानूसी-पन है। चार पैसे पास आए नह ं क खुद को नवाब “◌ाहंशाह का वंशज समझने लगगे।
ब च के पास कपड़े ह या न ह । कू ल से उ ह नकाल दए जाने क नो टस मल ह ,इसक कोई
च ता नह ं। सब ाथ मकताएं दर कनार...घर म बरयानी बननी ह चा हए, वरना इस कमाई का या
मतलब ! ताल म के नाम पर वह मदरसे और काम के नाम पर तमाम हुनर वाले काम ! कम उ
म ववाह और फर वह िज़ दगी के मसले। फर भी लोग मुझे अपनी तरह का य नह ं मानते...’’
कु मार अहमद के न को सुन चुप लगा गया। वह या जवाब देता?
ठ क इसी तरह अहमद चपकू तवार के न का या जवाब देता ?
वह ह दू मथक ,पुराण कथाओं ,और धम -शा के बारे म तो आ म व वास के साथ बात कर
सकता था, क तु इ लामी दु नया के बारे म उसक जानकार लगभग सफर थी।
‘‘मुझे एक मुसलमान य समझा जाता है, जब क मने कभी भी तुमको ह दू वगैरा नह ं माना ।
मुझे एक सामा य भारतीय “◌ाहर कब समझा जाएगा?’’
अहमद क आवाज म दद था ।
कल क तो बात है ।
वे दोन आदतन बस- टड के ढाबे म बैठे चाय क ती ा म थे। द तर से चुराए चंद फु सत के पल
...यह तो वह जगह है जहां वे दोन अपने दल क बात कया करते।
चाय वाला चाय लेकर आ गया ।
अहमद क तं ा भंग हुई ।
अि बकापुर से सुपर आ गइर्◌्र थी । बस- टड म चहल-पहल बढ़ गई । सुपर से काफ सवा रयां
उतरती ह ।
कर मपुर चूं क इलाके का यापा रक के है अत यहां सदा चहल-पहल रहती है।
चाय का घूंट भरते कु मार ने अहमद को टोका।
‘‘तुम इतनी ज द मायूस य हो जाते हो ? या यह अ पसं यक ि थ है, िजससे मु क के तमाम
अ पसं यक भा वत ह ?’’
‘‘कै से बताऊं क बचपन से म कतना ता ड़त होता रहा हूं।’’--अहमद सोच के सागर म गोते मारने
लगा।
‘‘जब म छोटा था तब सहपा ठय ने ज द ह मुझे अहसास करा दया क म उनक तरह एक
सामा य ब चा नह ं, बि क एक ‘कटुआ’ हूं ! वे अ सर मेर नकर खींचते और कहते क ‘अबे साले,
अपना कटा --- दखा न! पूरा उड़ा देते ह क कु छ बचता भी है ?’ कू ल के पास क मि जद से जुहर
के अजान क आवाज गूंजती तो पूर लास मेर तरफ देखकर हंसती। िजतनी देर अजान क आवाज
आती रहती म असामा य बना रहता। इ तहास का पी रयड उपा याय सर लया करते। जाने य
उ ह मुसलमान से चढ़ थी क वे मुगल-स ाट का िज़ करते आ ामक हो जाते। उनक आवाज म
घृणा कू ट-कू ट कर भर होती। उनके या यान का यह भाव पड़ता क अंत म पूर लास के ब चे
मुझे उस काल के काले कारनाम का मुज रम मान बैठते।’’
कु मार ने गहरा सांस लया--’’ छोड़ो यार ... दु नया म जो फे र-बदल चल रहा है उससे लगता है क
इंसान के बीच खाई अब बढ़ती ह जाएगी। आज देखो न, अफगा नय के पास रोट कोई सम या
नह ं। नई सद म धमाधता, एक बड़ी सम या बन कर उभर है।’’
अहमद बेहद दुखी हो रहा था।
कु मार ने माहौल नरम बनाने के लए चुटक ल --’’अहमद, सुपर से आज पूंछ-वाल मैडम नह ं उतर ं।
लगता है उ ह मह ने के क-ट भरे तीन दन का च कर तो नह ं ?’’
पूंछ-वाल यानी क पोनी-टेल वाल आधु नका...
कु मार क इस बात पर अ य दन कतनी जोर का ठहाका उठता था।
अहमद क ख नता के लए या जतन करे कु मार !
चाय कब खतम हो गई पता ह न चला ।
ढाबे के बाहर पान गुमट के पास वे कु छ देर के । अहमद ने सगरेट पी। कु मार ने पान खाया ।
अहमद जब तनाव म रहता, तब वह सगरेट पीना पसंद करता। उसके सगरेट पीने का अंदाज भी
बड़ा आ ामक हुआ करता ।
वह मु ी बांधकर उंग लय के बीच सगरेट फं सा कर ,मु ी को ह ठ के बीच टाइट सटा लेता । पूर
ताकत से मुंह से भरपूर धुंआ खींचता । कु छ पल सांस अंदर रख कर धुंआं अंदर के तमाम गल -कू च
म घूमने-भटकने देता । फर बड़ी नदयता से ह ठ को बचकाकर जो धुंआ फे फड़े सोख न पाए ह ,
उसे बाहर नकाल फकता ।
कु मार ने उसके सगरेट पीने के अंदाज से जान लया क आज अहमद बहुत ‘टशन’ म है।
वे दोन चुपचाप पो ट-आ फस म आकर अपने-अपने जॉब म य त हो गए।
अहमद को कहां पता था क उसके जीवन म इतनी बड़ी त द ल आएगी ।
वह तेरह सत बर क “◌ा◌ाम थी।
अहमद घर पहुंचा...देखा क कु लसूम ट वी से चपक हुई है।
कु लसूम पर समाचार सुन रह है।
आ चय!◌़ घनघोर आ चय !!◌़ ऐसा कै से हो गया...
अहमद सोचा, कु लसूम को समाचार चैनल से कतनी नफरत है।
वह अ सर अहमद को टोका करती --’’जब आप अखबार पढ़ते ह ह, तब आपको समाचार सुनने क
या ज रत...इससे अ छा क आप कोई धारावा हक ह देख लया कर। पूरा दन एक ह खबर को
घसीटते ह ये समाचार चैनल...िजस तरह एक बार खाने के बाद भस जुगाल करती है । जाने कहां
से इनको भी आजकल इतने ढेर सारे ायोजक मल जा रहे ह । ‘‘
अहमद या बताता। उसे मालूम है क खाते-पीते लोग के लए आजकल समाचार क या
अह मयत है । अहमद जानता है क समकाल न घटनाओं और उथल-पुथल से कटकर नह ं रहा जा
सकता । यह सूचना- ाि त का दौर है। कर मपुरा के अ य मुसलमान तरह उसे अपना जीवन नह ं
गुजारना। वह नए जमाने का एक सजग, चेतना-स प न युवक है। उसे मूढ़ बने नह ं रहना है। इसी
लए वह ह द अखबार पढ़ता है। ह द म थोड़ी बहुत सा हि यक अ भ यि तयां भी कर लेता।
अहमद जानता है क मी डया आजकल नई से नई खबर जुटाने म कै सी भी ‘ए सरसाइज’ कर सकता
है । चाहे वह डायना क मृ यु से जुड़ा संग हो ,नेपाल के राज प रवार के जघ य ह याका ड का
मामला हो , तहलका-ताबूत हो या क मौजूदा अमर क संकट...अचार, तेल, साबुन, जूता-च पल, गहना-
जेवर, काम-शि त वधक औश धय और गभ- नरोधक आ द के उ पादक एवम ् वतरक से भरपूर
व ापन मलता है समाचार चैनल को। यह कारण है क समाचार चैनल आजकल अ य चैनल से
अ धक मुनाफा कमा रहे ह।
कु लसूम यूज सुनने म इतनी मगन थी क उसे पता ह न चला क अहमद काम से वापस आ गया
है।
कु लसूम बीबीसी के समाचार बुले टन सुन रह थी। न पर ओसामा बन लादेन क त वीर उठाए
पा क तानी नौजवान के जुलूस पर पु लस ताबड़-तोड़ लाठ चला रह है। अमर क ेसीडट बुश और
लादेन के चेहरे का मला जुला कोलाज इस तरह बनाया गया था क ये जो लड़ाई अफगान क धरती
पर लड़ी जानी है वह दो आद मय के बीच क लड़ाई हो।
सनसनीखेज समाचार से भरपूर वह एक बड़ा ह खतरनाक दन था।
अहमद कु लसूम क बगल म जा बैठा ।
कु लसूम घबराई हुई थी।
ऐसे ह बाबर -मि जद व वंस के समय कु लसूम घबरा गई थी।
आज भी उसका चेहरा याह था । कु लसूम कसी गहन चंता म डूबी हुई थी ।
अहमद ने ट वी के न पर नजर गडऱ्◌ाइं। वहां उसे बुश-लादेन क त वीर के साथ चपकू तवार
और ीवा तव साहब के खि लयां उड़ाते चेहरे नजर आने लगे। उसे महसूस हुआ क चार तरफ
चपकू तवार क सरगो शयां और कहकहे गूंज रहे ह।
अहमद का दमाग चकराने लगा ।
जब कु लसूम ने अहमद क देखा तो वह घबराकर उठ खड़ी हुई ।
उसने त काल अहमद को बाह का सहारा देकर कु स पर बठाया। फर वह पानी लेने कचन चल
गई। पानी पीकर अहमद को कु छ राहत मल ।
उसने कु लसूम से कहा---’’जानती हो ...सन्◌् चैरासी के दंग के बाद अपने पुराने मकान के सामने
रहने वाले सख प रवार के तमाम मद ने अपने के श कु तरवा लए थे। ‘‘
कु लसूम क ◌े समझ म कु छ न आया। फर भी उसने प त क हां म हां मलाई---’’हां , हां, परमजीते
के भाई और बाप दाढ़ -बाल बन जाने के बाद पहचान ह म न आते थे ?’’
‘‘बड़ी थू-थू मची है कु लसूम चार तरफ...हर आदमी हम लादेन का हमायती समझता है। हम उसक
लाख मज मत कर कोई फक नह ं पड़ता। ‘‘ अहमद क आवाज हताशा से लबरेज थी।
अचानक अहमद ने कु लसूम से कहा--’’ मग रब क नमाज का व त हो रहा है। मेरा पैजामा-कु ता
और टोपी तो नकाल दो।’’
कु लसूम चक पड़ी।
आज उसे अपना अहमद डरा-सहमा और कमजोर सा नजर आ रहा था।
3 गहर जड़
असगर भाई बड़ी बेचैनी से जफर क ती ा कर रहे ह।
जफर उनका छोटा भाई है।
उ होन सोच रखा है क वह आ जाए तो फर नणय ले ह लया जाए, ये रोज-रोज क भय- च ता
से छु टकारा तो मले !
इस मामले को यादा दन टालना अब ठ क नह ं।
कल फोन पर जफर से बहुत देर तक बात तो हुई थीं।
उसने कहा था क ---’भाईजान आप परेशान न ह , म आ रहा हूं।’
असगर भाई ‘हाईपर-टशन’ और ‘डाय बट ज’ के मर ज ठहरे। छोट -छोट बात से परेशान हो जाते ह।
मन बहलाने के लए जफर बैठक म आए।
मुनीरा ट वी देख रह थी। जब से ‘गोधरा - करण’ चालू हुआ, घर म इसी तरह ‘आज-तक’ और
‘ टार- लस’ चैनल को बार -बार से चैनल बदल कर घंट से देखा जा रहा था। फर भी चैन न पड़ता
था तो असगर भाई रे डयो- ांिज टर पर बीबीसी के समाचार से देशी मी डया के समाचार का
तुलना मक अ ययन करने लगते।
तमाम चैनल म नंगे-नृशंस यथाथ को दशक तक पहुंचाने क होड़ सी लगी हुई थी।
मुनीरा के हाथ से असगर ने रमोट लेकर चैनल बदल दया।
‘ ड कवर -चैनल’ म हरण के झु ड का शकार करते “◌ोर को दखाया जा रहा था। “◌ोर गुराता हुआ
हरण को दौड़ा रहा था। अपने ाण क र ा करते हरण अंधाधुंध भाग रहे थे।
असगर भाई सोचने लगे क इसी तरह तो आज डरे-सहम लोग गुजरात म जान बचाने के लए भाग
रहे ह।
उ होन फर चैनल बदल दया। नजी समाचार-चैनल का एक य कै मरे का सामना कर रहा था।
कांच क बोतल से पे ोल-बम का काम लेते अहमदाबाद क बहुसं यक लोग और वीरान होती
अ पसं यक आबा दयां। भीड़-तं क बबरता को बड़ी ढ ठता के साथ ‘सहज- त या’’ बताता एक
स ता-पु श। टेल वजन पर चलती ढ ठ बहस क रा य पु लस को और मौका दया जाए या क सेना
‘ ड लाय’ क जाए ।
स ता-प और वप के बीच मृतक-सं या के आंकड़ पर उभरता तरोध। स ता-प क दल ल क
सन ् चैरासी के क लेआम से ये आंकड़ा काफ कम है। उस समय आज के वप ी तब के म थे
और कतनी मासू मयत से यह दल ल द गई थी -- ‘‘ एक बड़ा पेर गरने से भूचाल आना वाभा वक
है।’’
इस बार भूचाल तो नह ं आया क तु यूटन क ग त के तृतीय नयम क धि जयां ज र उड़ाई गइं।
‘ या के वपर त त या...’’
असगर भाई को हंसी आ गई।
उ होन देखा ट वी म वह संवाददाता दखाई दे रहे थे जो क कु छ दन पूव झुलसा देने वाल गम
म अफगा न तान क पथर ल गुफाओं, पहाड ◌़ और यु के मैदान से ता लबा नय को खदेड़ कर
आए थे, और बमुि कल तमाम अपने प रजन के साथ चार-छह दन क छु यां ह बता पाए ह गे
क उ ह पुन एक नया ‘टा क’ मल गया।
अमे रका का र त-रंिजत तमाशा, लाश के ढेर, राजनी तक उठापटक, और अपने चैनल के दशक क
मान सकता को ‘कै श’ करने क यवसा यक द ता उन संवाददाताओं ने ा त जो कर ल थी।
असगर भाई ने यह वड बना भी देखा◌ी क कस तरह नेतृ व वह न अ पसं यक समाज क
व वसंक ओसामा बन लादेन के साथ सुहानुभू त बढ़ती जा रह थी।
जब क ‘डब यू ट ओ’ क इमारत सफ अमर का क बपौती नह ं थी। वह इमारत तो मनु य क मेधा
और वकास क दशा का जीव त तीक थी। िजस तरह से बा मयान के बु एक पुराताि वक धरोहर
थे।
‘डब यू ट ओ’ क इमारत म काम करने का व न सफ अमर क ह नह ं बि क तमाम देश के
नौजवान नाग रक देखा करते ह। बा मयान करण हो या क यारह सत बर क घटना, असगर भाई
जानते ह क ये सब गैर-इ ला मक कृ त ह, िजसक दु नया भर के तमाम अमनपसंद मुसलमान ने
कड़े “◌ा द म न दा क थी।
ले कन फर भी इ लाम के दु मन को संसार म म फे लाने का अवसर मल आया क इ लाम
आतंकवाद का पयाय है।
असगर भाई को बहुसं यक हंसा का एकतरफा ता डव और “◌ा◌ासन- शासन क चु पी देख और भी
नराशा हुई थी।
ऐसा ह तो हुआ था उस समय जब इं दरा गांधी का मडर हुआ था।
असगर तब बीस-इ क स के रहे ह गे।
उस दन वह जबलपुर म एक लॉज म ठहरे थे।
एक नौकर के लए सा ा कार के सल सले म उ ह बुलाया गया था।
वह लॉज एक सख का था।
उ ह तो खबर न थी क देश म कु छ भयानक हादसा हुआ है। वह तो तयो गता और सा ा कार से
स बं धत कताब म उलझे हुए थे।
“◌ा◌ाम के पांच बजे उ ह कमरे म धूम-धड़ाम क आवाज सुनाई द ं।
वह कमरे से बाहर आए तो देखा क लॉज के रसे शन काउ टर को लाठ -डंडे से लैस भीड़ ने घेर
रखा था। वे सभी लॉज के सख मैनेजर करनैल संह से बोल रहे थे क वह ज द से ज द लॉज को
खाल करवाए, वरना अ जाम ठ क न होगा।
मैनेजर करनैल संह घ घया रहा था क टेशन के पास का यह लॉज मु त से परदे सय क मदद
करता आ रहा है।
वह बता रहा था क वह सख ज र है क तु खा ल तान का समथक नह ं। उसने यह भी बताया क
वह एक पुराना कां ेसी है। वह एक िज मेदार ह दु तानी नाग रक है। उसके पूवज ज र पा क तानी
थे, ले कन इस बात म उन बेचार का दोश कहां था। वे तो धरती के उस भूभाग म रह रहे थे जो क
अख ड भारत का एक अंग था। य द त काल न आकाओं क राजनी तक भूख नयं त रहती तो
बंटवारा कहां होता ?
कतनी तकल फ सहकर उसके पूवज ह दु तान आए। कु छ करोलबाग द ल म तथा कु छ
जबलपुर म आ बसे। अपने बखरते वजूद को समेटने का पहाड़- यास कया था उन बुजुग ने।
“◌ारणाथ मद-औरत और ब चे सभी मलजुल, तनका- तनका जोड़कर आ शयाना बना रहे थे।
करनैल संह रो-रोकर बता रहा था क उसका तो ज म भी इसी जबलपुर क धरती म हुआ है।
भीड़ म से कई च लाए--’’मारो साले को...झूट बोल रहा है। ये तो प का आतंकवाद है।’’
उसक पगड़ी उछाल द गई।
उसे काउ टर से बाहर खींच गया।
जबलपुर वैसे भी मार-धाड़, लूट-पाट जैसे ‘माशल-आट’ के लए कु यात है।
असगर क समझ म न आ रहा था क सरदारजी को काहे इस तरह से सताया जा रहा है।
तभी वहां एक नारा गूंजा--
‘‘ पकड़ो मार साल को
इं दरा मैया के ह यार को!’’
असगर भाई का माथा ठनका।
अथात धानमं ी इं दरा गांधी क ह या हो गई !
उसे तो फिज स, के म , मैथ के अलावा और कोई सुध न थी।
यानी क लॉज का नौकर जो क ना ता-चाय देने आया था सच कह रहा था।
देर करना उ चत न समझ, लॉज से अपना सामान लेकर वह त काल बाहर नकल आए।
नीचे अ नयं त भीड़ स य थी।
सख क दुकान के “◌ा◌ीशे तोड़े जा रहे थे। सामान को लूटा जा रहा था। उनक गा ड़य म, मकान
म आग लगाई जा रह थी।
असगर भाई ने यह भी देखा क पु लस के मु ी भर सपाह तमाशाई बने नि य खड़े थे।
ज दबाजी म एक र ा पकड़कर वह एक मुि लम बहुल इलाके म आ गए।
अब वह सुर त थे।
उसके पास पैसे यादा न थे।
उ ह पर ा म बैठना भी था।
पास क मि जद म वह गए तो वहां नमािज़य क बात सुनकर दंग रह गए।
कु छ लोग पेश-इमाम के हुजरे म बीबीसी सुन रहे थे।
बात हो रह थीं क पा क तान के सदर को इस ह याका ड क खबर उसी समय मल गई, जब क
भारत म इस बात का चार कु छ देर बाद हुआ।
ये भी चचा थी क फसादात क आंधी “◌ाहर से होती अब गांव-गल -कू च तक पहुंचने जा रह है।
उन लोग से जब उ ह ने दरया त क तो यह सलाह मल --’’बरखुरदार! अब पढ़ाई और
इ तेहानात सब भूलकर घर क राह पकड़ लो, य क ये फसादात खुदा जाने जब तक चल।
बात उनक समझ म आई।
वह उसी दन घर के लए चल दउ । रा ते भर उ ह ने देखा क िजस लेटफाम पर गाड़ी क
सख पर अ याचार के नशानात साफ नजर आ रहे थे।
उनके अपने नगर म भी हालात कहां ठ क थे।
वहां भी सख के जान-माल को नशाना बनाया जा रहा था।
ट वी और रे डयो से सफ इं दरा-ह याका ड और खा ल तान आंदोलन के आतंकवा दय क ह बात
बताई जा रह थीं।
लोग क स वेदनाएं भड़क रह थीं।
खबर उठतीं क गु वारा म सख ने इं दरा ह याका ड क खबर सुन कर पटाखे फोड़े और मठाईयां
बांट ं ह।
अफवाह का बाजार गम था।
दंगाईय -बलवाइय को डेढ़-दो दन क खुल छू ट देने के बाद शासन जागा और फर उसके बाद
नगर म क यू लगाया गया।
य द वह धनौनी हरकत कह ं मुि लम आतंकवा दय ने क होती तो ?
उस दफा सख को सबक सखाया गया था।
इस बार...
जफर आ जाएं तो फै सला कर लया जाएगा।
जैसे ह असगर भाई कु छ समथ हुए, उ ह ने अपना मकान मुि लम बहुल इलाक म बनवा लया था।
जफर तो नौकर कर रहा है क तु उसने भी कह रखा है क भाईजान मेरे लए भी कोई अ छा सा
स ता लॉट देख र खएगा।
अब अ बा को समझाना है क वे उस भूत-बंगले का मोह याग कर चले आएं इसी इ ाह मपुरा म।
इ ाह मपुरा ‘ मनी-पा क तान’ कहलाता है।
असगर भाई को यह तो पसंद नह ं क कोई उ ह ‘पा क तानी’ कहे क तु इ ाह मपुरा म आकर उ ह
वाकई सुकू न हा सल हुआ था। यहां अपनी हुकू मत है। गैर दब के रहते ह। इ मीनान से हरेक मजहबी
तीज- योहार का लु फ उठाया जाता है। रमजान के मह ने म या छटा दखती है यहां। पूरे मह ने
उ सव का माहौल रहता है। चांद दखा नह ं क हंगामा “◌ा◌ु हो जाता है। ‘तरावीह’ क नमाज म
भीड़ उमड़ पड़ती है।
यहां साग-स जी कम खाते ह लोग य क स ते दाम म बड़े का गो त जो आसानी से मल जाता
है।
फ़जा म सु हो-शाम अजान और द दो-सलात क गूंज उठती रहती है।
‘शबे-बरात’ के मौके पर थानीय मजार “◌ार फ म गजब क रौनक होती है। मेला, मीनाबाजर लगता
है और क वाल के “◌ा◌ानदार मुकाबले हुआ करते ह।
मुहरम के दस दन “◌ाह दाने-कबला के गम म डूब जाता है इ ाह मपुरा !
सफ मयांओं क तूती बोलती है यहां।
कसक मजाल क आंख दखा सके । आंख नकाल कर हाथ म धर द जाएंगी।
एक से एक ‘ ह -शीटर’ ह यहां।
अरे, खालू का जो तीसरा बेटा है यूसुफ वह तो जाफरानी-जदा के ड बे म बम बना लेता है।
बड़ी-बड़ी राजनी तक हि तयां भी ह िजनका संर ण इलाके के बेरोजगार नौजवान को मला हुआ है।
असगर भाई को च ता म डूबा देख मुनीरा ने ट वी ऑफ कर दया।
असगर भाई ने उसे घूरा--
‘‘ काहे क च ता करते ह आप...अ लाह ने िज़ दगी द है तो वह पार लगाएगा। आप के इस तरह
सोचने से या दंगे-फसाद ब द हो जाएंगे ?’’
असगर भाई ने कहा--’’ वो बात नह ं, म तो अ बा के बारे म ह सोचा करता हूं। कतने िज़ ी ह वो।
छोड़गे नह ं दादा-पुरख क जगह...भले से जान चल जाए।’’
‘‘ कु छ नह ं होगा उ ह, आप खामखां फ़ कया करते ह। सब ठ क हो जाएगा।’’
‘‘खाक ठ क हो जाएगा। कु छ समझ म नह ं आता क या क ं ? बुढ़ऊ स ठया गए ह और कु छ नह ं
। सोचते ह क जो लोग उ हे◌े सलाम कया करते ह मौका आने पर उ ह ब श दगे। ऐसा हुआ है
कभी। जब तक अ मा थीं तब तक ठ क था अब वहां या रखा है क उसे अगोरे हुए ह।’’
मुनीरा या बोलती। वह चुप ह रह ।
असगर भाई मृ त के सागर म डूब-उतरा रहे थे।
अ मा बताया करती थीं क सन इकह तर क लड़ाई म ऐसा माहौल बना क लगा उजाड़ फकगे
लोग। आमने-सामने कहा करते थे क हमारे मुह ले म तो एक ह पा क तानी घर है। चींट क तरह
मसल दगे।
‘‘चींट क तरह...हुंह..’’ असगर भाई बुदबुदाए।
कतना घबरा गई थीं तब वो। चार ब च को सीने से चपकाए रखा करती थीं।
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gahri jaden

  • 1. गहर जड़: कथा सं ह: अनवर सुहैल अनु म णका: 1. नीला हाथी 2. यारह सत बर के बाद 3. गहर जड़े 4. चह लुम 5. दहशतगद 6. पुरानी र सी 7. नसीबन 8. पी ह जाम उफ हज़रतजी 9. कुं जड़-कसाई 10. फ ते भाई 1 नीला हाथी
  • 2. क पनी के काम से मुझे बलासपुर जाना था। मेरे फोरमेन खेलावन ने बताया क य द आप बाई-रोड जा रहे ह तो कटघोरा के पास एक थान है वहां ज र जाएं। मेन रोड से एक कलोमीटर पहले बाई तरफ जो सड़क नकल है, उस पर बस मुि कल से दो कलोमीटर पर एक मजार है। वह मजार तो मुसलमान का है ले कन वहां एक ह दू अह र को पीर बाबा क सवार आती है। ये सवार आती है शु वार को, इस लए येक शु वार वहां मेला सा लगता है। अह र पर पीर बाबा सवार होते ह और लोग क िज ासाओं का जवाब देते ह। मने खेलावन फोरमेन से कहा-’’अपने देश क यह तो वशेषता है, नेता जात-पात के नाम पर लोग को भड़काते ह और जनता है क देखो कै से घुल - मल है।’’ खेलावन फोरमेन मेर बात सुन कर खुश हुआ, बोला-’’साहब, पछल दफा म वहां गया तो जानते ह बड़ा चम कार हुआ। जैसे ह म वहां पहुंचा, अह र पर पीर बाबा क सवार आई हुई थी। भीड़ बहुत थी। मने सोचा क इतनी भीड़ म दशन न हो पाएगा। ले कन तभी पीर बाबा क सवार बोल क देखो तो कोतमा से कौन आया है? लोग ने एक-दूसरे क तरफ देखना शु कया तब मने बाबा को बताया क बाबा म हूं खेलावन, कोतमा से आया हूं। तब पीर बाबा ने मुझे अपने पास बुलाया और भभू त मेरे गाल पर मल द । मजार के बाहर जो अगरबि तयां जलती ह उनक राख क भभू त ह बाबा का साद होता है साहब। बताईए, ह न थान क म हमा!’’ मने उसे बताया क स भव हुआ तो ज र वहां जाऊं गा। मुझे वैसे भी मजार म बड़ी च है। इस लए नह ं क मुझे मजार म ा है, बि क इस लए क वहां आ था, बाजार और अंध व वास के नए-नए प देखने को मलते ह। ये मजार न होते तो न होतीं इलायची दाना, रेवड़ी क दुकान। ये मजार न होते तो चादर , फू ल और त बीह-मालाओं का कारोबार न चलता। ये मजार न होते तो कै सेट, इ , अगरबि तय के उ योग का या होता? ये मजार न होते तो क वा लये बेकार हो गए होते? ये मजार न होते तो ालु इतनी गैर-ज र या ाएं न करते और बस-रेल म भीड़ न होती। ये मजार न होते तो लड़का पैदा करने क इ छाएं दम तोड़ जातीं। ये मजार न होते तो जादू-टोने जैसे छु पे दु मन से आदमी कै से लड़ता? ये मजार न होते तो खदमतगार , भखा रय , चोर और बटमार को अ डा न मलता?
  • 3. शायद इसी लए मुझे मजारात म च है। कटघोरा वाल मजार के बारे म जानकर लगा क चलो देखा जाए य क कटघोरा म मेरा बचपन गुजरा है। इसी बहाने पुरानी याद ताजा हो जाएंगी। खेलावन फोरमेन ने मुझे रा ते क बार कयां समझाइं क कहां तक प क रोड है और कतनी दूर तक क ची सड़क है। मने सभी ववरण डायर म नोट कर लया। मेरे अ बू कटघोरा के हायर सेक डर कू ल म पढ़ाते थे। मने वहां म डल कू ल तक क श ा पाई थी। फर अ बू का तबादला खर सया हो गया। मने रायपुर इंजी नय रंग कॉलेज से मेके नकल इंजी नय रंग क और कोयला खदान म इंजी नयर बन गया। मोशन पाते-पाते सुप रटे डट इंजी नयर हो गया हूं। कटघोरा म चूं क हम सरकार आवास म रहते थे, इस लए वहां फर जाना हो नह ं पाया था। अ बू ने रटायरमट के बाद रायपुर म मकान बना लया सो कटघोरा से उनका भी कोई लंक न रहा। अपनी कार से म कटघोरा के पास पहुंचा तो खेलावन फोरमैन क बात याद हो आई। मने सोचा क पहले कटघोरा बस टड पहुंच कर चाय पी जाए फर आगे क सोची जाएगी। वैसे भी बस- टड ह कटघोरा का दय- थल है। वहां क चहल-पहल से पुरानी याद ताजा ह गी। बचपन म दो त के साथ हम बस- टड आते थे। म बस- टड क कताब क दुकान से पराग और नंदन जैसी बाल-प काएं खर दा करता था। सरकार आवास भी आगे सड़क के कनारे थे। हमारा वाटर सबसे कनारे था। अ मी को बागवानी का “◌ा◌ौक था इस लए वाटर के बगल म और पीछे नाले तक अ बू ने तार से घेरा बनवा दया था। कू ल का चपरासी अ मी क बागवानी म मदद कया करता था। अ मी उस छोटे से कचन-गाडन म लहसुन, ह द , पपीता, अम द और के ला लगवाया करती थीं। साग, ध नया और पुद ना भी होता। गुलाब, लल और सेवंती क या रयां देखने लायक हुआ करती थीं। स दय के दन थे।
  • 4. कटघोरा बस- टड म काफ भीड़-भाड़ थी। लोग धूप तापते हुए बस का इंतजार कर रहे थे। कु छ बस आ रह थीं, कु छ जा रह थीं। कोने क चाय गुमट के पास मने कार रोक और एक कड़क चाय कम चीनी क बनाने का आडर दया। पता नह ं य मुझे अ छे होटल म बैठ कर चाय पीने म मजा य नह ं आता? मुझे इसी तरह गुम टय म चाय पीना बहुत अ छा लगता है। दुकानदार ने खास तव जो द और त परता से एक कड़क चाय बनाकर पेश क । चाय क चुि कय के बीच म माहौल का जायजा लेने लगा। बस- टड पहले से काफ भरा-पूरा हो गया है। इतनी दुकान पहले कहां थीं? र े क जगह ऑटो ने ले ल है। कई क प नय के मोबाईल टॉवर दखलाई पड़ रहे ह। चाय पीकर मने सगरेट सुलगाई और कताब क दुकान जा पहुंचा। वहां अब एक लड़का बैठा हुआ था। प काओं पर एक नगाह डालते हुए मने पूछा-’’हंस है?’’ लड़का मोबाईल का ईयरफोन कान म ठूंसे कोई गीत सुन रहा था। मेरा न सुनकर जोर से बोला- ’’नह ं, बकता नह ं। इं डया-टुडे ले ल िजए।’’ मने देखा क वहां ‘वय क के लए’ “◌ा◌ीशक लए कई रंग- बरंगी प काएं द शत थीं। एक तरफ बाबा रामदेव क कताब और हनुमान चाल सा, गीता आ द अ य धा मक कताब थीं। मने सगरेट ख म क और कार टाट कर अपने उस वाटर क तरफ कार मोड़ द जहां मेरे बचपन के दन गुजरे थे। मेन रोड के कनारे हमारा आवास अब ख डहर म त द ल हो चुका था। लगता है क अब सरकार ने नई जगह कॉलोनी बना ल है। आवास से लगा नाला अब दखलाई नह ं देता। वहां कई अवैध मकान क पौध उग आई है। तेजी से फै लते “◌ाहर करण का नमूना देख मेरा दल भर आया। मने कार वापस बलासपुर जाने वाल सड़क क तरफ मोड़ द । मुझे मजार भी जाना था। तग डे पर आकर बलासपुर जाने वाल सड़क पर कार दौड़ रह थी। खेलावन फोरमैन ने बताया था क तग डे से लगभग एक कलोमीटर बाद बाई तरफ एक सड़क कटती है। उस पर एक कलोमीटर जाना है और वह ं मजार है। मने इ मीनान से कार चलाते हुए मजार तक का सफर तय कया।
  • 5. देखा क एक गु बदनुमा इमारत तैयार हो रह है। हरे रंग का गु बद दूर से दखता है। दन के बारह बज रहे थे। मजार के आस-पास आठ-दस दुकान थीं, िजनम चादर, फू ल और “◌ा◌ीरनी बेची जाती है। मने कार एक कनारे खड़ी क , जेब से माल नकाल कर सर पर बांध लया और एक दुकान के सामने जा खड़ा हुआ। इस बीच कई दुकानदार ने मुझे अपनी ओर आवाज देकर बुलाना चाहा। मने कहा-’’कोई एक जगह ह जा पाउंगा भाई!’’ दुकानदार एक दुबला-पतला वृ था, िजसने हरे रंग का कु ता और सर पर हरे रंग क टोपी पहन रखी थी। उसने मुझे सलाम कया और कहा-’’जूते उतार कर अंदर चले जाइए, वजू बना ल िजए।’’ मने जूते उतारे और अंदर चला गया। वहां एक कोने म नल लगा था और बैठकर वजू बनाने क यव था थी। वजू बनाकर मने दुकानदार से कहा-’’इं यावन पए क चादर और “◌ा◌ीरनी का जुगाड़ बना द।’’ दुकानदार ने लाि टक क ड लया म एक हरे और लाल रंग क चादर रखी, इ , अगरब ती और रेवड़ी का पैके ट रखा। ड लया मने बड़ी ा से सर पर उठाई और मजार क तरफ चल पड़ा। कई भखार मेर ओर लपके । उनसे बचते-बुचाते गु बदनुमा मजार के अंदर म वेश कर गया। इससे पहले म िजस मजार “◌ार फ म गया तो एक आ याि मक “◌ा◌ा◌ं त का अनुभू त पाया था ले कन उस मजार म मुझे ऐसा एकदम नह ं लगा क कसी हानी जगह म दा ख़ल हो रहा हूं। हरा गु बद सर पर सजाए वह एक बड़ा सा चैकोर कमरा था। सुनहरे रंग के बाडर वाला एक खुशनुमा दरवाजा, िजसके बाहर दोन तरफ लोग बैठे हुए थे। सुनहरे दरवाजे पर अरबी म कलमा लखा हुआ था। ‘लाइलाहा इ ल लाह, मुह मदुरसूलु लाह’
  • 6. मने बडे अदब से दरवाजे क चैखट का एक हाथ से बोसा लया और ड लया स भाले मजार के अंदर दा खल हुआ। मने मन ह मन मजार को सलाम कया-’’अ सलामो अलैकु म या अहले कु बूर!’’ फर मने अंदर का जाएजा लया। वहां मने देखा क हरा चोगा पहने एक आदमी मजार क तरफ मुंह कए कु छ बुदबुदा रहा है। उसक पीठ मेर तरफ थी। “◌ा◌ायद वह फा तहा पढ़ रहा था। म हरे चोगे वाले आदमी के सामने जा पहुंचा और बना उसके चेहरे क तरफ देखे ड लया बढ़ाई, ता क पहले मजार “◌ार फ का बोसा ले लूं। ड लया पकड़ाकर मने हरे चोगे ़ वाले आदमी के चेहरे क तरफ देखा, मुझे “◌ा ल कु छ पहचानी सी लगी। अचानक मेरे जेहन म अपने साथ म डल तक के पढ़े क लू उफ कल म मुह मद क त वीर उभर आई। मने देखा क हरे चोगे ़ वाला आदमी भी मुझे इस नजर से देख रहा है जैसे वह अतीत के चल च म कु छ खोज रहा हो। म मु कु राया। हरे चोगे वाला आदमी का चेहरा मेर मु कान देख अचानक भावह न हो गया। उसने चुपचाप ड लया ल । यं वत ड लया म से हर चादर नकाल और चादर मजार पर चढ़ाने लगा। मने भी चादर का एक कोना पकड़ कर चादर-पोशी म ह सा लया। फर उसने ड लया म से “◌ा◌ीरनी का पैकट नकाला, एक कोना फाड़ा और मजार के कनारे उसे रखा। इ क “◌ा◌ीशी खोल इ को चादर पर छ ंट दया और आंख बंद कर फा तहा पढ़ने लगा। मने भी फा तहा वानी के लए हाथ उठा लए। हरे चोगे ़ वाला आदमी अब मुझे अ छ तरह पहचान म आ गया। वह क लू ह था। मने चेहरे पर हाथ फे रते हुए मजार क प र मा क और दान-पेट म एक सौ पए का नोट डाला तो देखा क हरे चोगे वाला आदमी मुझे देख रहा है। मने मजार क कदमबोसी क और हरे चोगे वाले के पास पहुंचा।
  • 7. उसने मोरपंख के झाड़ू मेर पीठ पर फे र और मेरे कान के पास मुंह लाकर बुदबुदाया-’’जाइएगा नह ं, कु छ बात करनी है।’’ मने हामी भर और “◌ा◌ीरनी लेकर मजार से बाहर नकल आया। तब तक जाने कहां से कु छ क वाल आ गए थे। मै◌े क वाल के पास बैठ गया और क वाल का लु फ उठाने लगा। ‘भर दे झोल मेर या मुह मद लौट कर म न जाउंगा खाल ’ म क वाल के बोल सुनते हुए हरे चोगे वाले मुजाबर यानी क लू उफ कल म मोह मद व द मोह मद सल म आ तशबाज क याद म खो गया। इतवार का दन था। सुबह के आठ बजे ह गे। तालाब सुनसान ह था। गांव के लोग और पशुओं के आने का अभी समय नह ं हुआ था। बारह वश य न हा क लू नडर होकर उकड़ू बैठा खुरपी से म ी खोद रहा था। वह काम के धुन म मगन था। वह ं छपाक् छपाक् मढक पानी और कनारे वाला कोई खेल खेलने म मशगूल थे, रह अपनी बला से, न हे क लू क त ा इन छपाक् से भंग होने वाल नह ं है। उसने उस म ी का ठकाना जान लया है िजससे वह कै से भी आकार बना सकता था। जब क लू न हा सा ब चा था तब वह अपनी अ मी को रसोई म परेशान कया करता था। वह जमाना गैस का नह ं था। लकड़ी से जलने वाला म ी का दोमुंहा चू हा जलता और उसक लाल आंच म खाना पकाती अ मी क आकृ त क लू को कसी पर सी लगती थी। लकड़ी क धीमी आंच म दाल पकती और रो टयां संकतीं। क लू दोन तरफ कड़क संक रोट खाया करता था। तीन बहन के बाद उसक आमद हुई थी सो क लू का घर म बड़ा मान था। बहन भी उसे यार कया करती थीं। अ मी आटा गूंधना “◌ा◌ु करतीं क क लू उनके पास जा पहुंचता और बोलता-’लोई से च ड़या बना दो न अ मी!’ या क ‘चूहा बना दो न अ मी!’
  • 8. अ मी ब चे क िज़द को पूरा करती और थोड़े सा आटा लेकर क लू के लए च ड़या या चूहा बना देती। उसके बाद क लू उस आटे के खलौने से खेलता। कु छ देर बाद क लू आटे के खलौन को पुन ल दे क “◌ा ल दे देता और अपनी क पना-शि त से आम, के ला या आदमी का मुंह बनाता। धीरे-धीरे वह हाथी बनाना सीख गया। हाथी बनाकर वह उसे चू हे के अंगार म पकाता और फर याह से रंग कर देता। फर दो त को दखाता-’’देखो देखो, नीला हाथी!’’ वह जब भी अपने न नहाल जाता तो नानी के घर के पास रहने वाले कु हार के काम को घ ट नहारा करता था। वह कु हार को म ी बनाने क तैयार करते देखता। वाकई बेदाग मुलायम चकनी म ी को घड़ा आ द बनाने के लए तैयार करना काफ मसा य काय था। जब गूंथी हुई म ी का ल दा घूमते चाक पर चढ़ता और कु हार के जादुई पश से घड़े क “◌ा ल म, या सुराह म बदलता तो न हा क लू अचं भत खड़ा देखता रहता। उसके आ चय का ठकाना न रहता। वह थोड़ा बड़ा हुआ तो काल मं दर के पास बसे बंगाल कलाकार के पास जाने लगा। वहां गणेश भगवान, दुगा मां, काल मां, सर वती, रा स और “◌ोर आ द क मू तयां बनते देखा करता। कस तरह कलाकार खपि चय का ढांचा खड़ा करते ह। फर पुआल और सुतल क सहायता से व भ न आकार बनाते ह क ऐसा आभाश होता जैसे आदमी या जानवर के कं काल खड़े ह । कं काल म म ी का लेप चढ़ता तो बना सर क मू तयां बन जातीं। ी “◌ार र, पु श “◌ार र और जानवर के बना सर के िज म। कलाकार के पास मुंह के अलग-अलग सांचे हुआ करते। कसी सांचे म देवी दुगा का मुंह बन जाता, कसी सांचे से भगवान राम क मुखाकृ त। कसी सांचे से गणेश भगवान का चेहरा बनता और कसी सांचे से रा स के भयानक मुंह। “◌ोर, मोर, चूहा, सांड के मुंह के सांचे भी यथावसर उपयोग कए जाते। क लू के इस मू त ेम ने उसके जीवन म हलचल मचाई थी। वह बहुत बाद क बात है। पाठशाला म ह त श प क पर ा के समय म ी के खलौने बना कर जमा करना होता था। क लू के खलौने सभी खलौन से अलग होते। वह म ी से सीताफल ऐसा बनाता क असल का म
  • 9. होता। हां, उसके पास रंग न होते और वह याह से उसे रंगता। हरा क जगह नीला सीताफल। श क उसे ह त श प म पूरे न बर दया करते। म ी के के ले बनाता तो उसम पसी ह द घोलकर रंग भरता। फर कहता क ये पके के ले ह। क लू कू ल म होने वाले गणेशो सव के लए इस बार वयं गणप त क मू त बनाने के लए परेशान था। कू ल के तवार मा साब उसे ो सा हत कर रहे थे क इस बार मू त वह बनाए। बारह वश य क लू उफ कल म मोह मद आ मज मोह मद सल म आ तशबाज ने बड़ी लगन से गणप त ब पा क दो ब ते क मू र्त बनाई। इसी लए क लू सुबह-सुबह तालाब के कनारे बैठा म ी इक ा कर रहा था। वह म ी कू ल ले जाता। वहां ाउ ड के कनारे ाचाय के ऑ फस के पीछे उसने अपना कायशाला बनाई थी। क लू ने सोचा क दो दन के अंदर मू त तैयार करेगा। तवार मा साब ने क लू क मदद के लए “◌ा◌ंकर चपरासी के लगाया था। “◌ा◌ंकर ने क लू के लए खि चयां, पुआल और सुतल क यव था कर द थी। हां, गणप त ब पा के मुंह के लए सांचा तो था नह ं। न हे क लू ने बना सांचे के गणेश भगवान का चेहरा बनाने का नणय लया था। “◌ा◌ंकर ने एक कै ले डर ला दया था िजसम गणप त क मनमोहक मु ा थी। क लू ने बड़ी त मयता से मू त नमाण का काय अंजाम दया। “◌ा◌ंकर के कहने पर क लू त दन नहा कर आता ता क मू त नमाण म प व ता बरकरार रहे। उसने खपि चय का ढांचा खड़ा कया। फर पुआल और सुतल क सहायता से गणेश जी का आकार बनाया। धीरे-धीरे उसने पुआल पर म ी चढ़ाई और बना सांचे क सहायता से गणेश भगवान क ऐसी तमा बनाई क देखने वाले देखते रह जाएं। तवार मा साब बोलते-’अ ुत तभा है बालक म। मां सर वती का वरदान मला है इसे। देखो तो कतनी जीव त तमा बना द है इसने।’ वाकई हम ब च को बड़ा अजीब लगता क कै से हमारा एक हमउ इतनी सफाई और लगन से मू त नमाण के काय को अंजाम दे रहा है। तवार मा साब ने “◌ा◌ंकर से क लू के लए रंग क पु ड़या मंगवा द । मू त सूखी तो क लू ने रंग का लेप चढ़ाया। तवार मा साब ने मू त का ृंगार-आभूशण आ द मंगा दया, कै ले डर को देख-देख क लू ने गणेश भगवान क मू त का ऐसा ृंगार कया क जो देखे दंग रह जाए।
  • 10. उसने मू त के पास रखने के लए एक छोटा सा चूहा भी बनाया, गणप त ब पा क सवार मूशक। फर एक त ती पर उसने बड़ी टाईल से लखा- व तु ड महाकाय सूयको ट सम भा न व नं कु मे देव, सवकायशु सवदा तवार मा साब ने व यालय म उसी मू त क थापना क और पूजन कया। यह बात उड़ते-उड़ते मुसलमान क ब ती म भी पहुंची। हम ब च को तो खास मतलब न था, ले कन सुनते ह क क लू के इस मू त नमाण ने उसके जीवन म कई त द लयां लाइं। क लू के अ बू मोह मद सल म आ तशबाज क जमकर मज मत क गई। उनसे कहा गया क क लू को मि जद लाकर उससे सामू हक प से माफ मंगवाई जाए और तौबा करवाई जाए। सल म आ तशबाज बड़े अकड़ू क म के इंसान थे। थे भी पूरे सवा छ फु ट के कद के आदमी। कहते थे क ह दु तानी मुसलमान तो ह नह ं, उनके पूवज इराक से आए थे। वह वयं को इराक कहा करते थे और नगर के मुसलमान को नीची नजर से देखते थे। कहते थे क हुजूर ने कहा है क हक- हलाल क कमाई खाओ, म मेहनत करता हूं। आ तशबाजी का हुनर मुझे मेरे पूवज से मला है, इस लए इसम लोग को एतराज य होता है? म कोई याज के पैसे खाता नह ं, हरामकार करता नह ं फर मुझसे लोग चढ़ते य ह? बेटे क लू के कारण हुई इस फजीहत से वह बेहद दुखी रहने लगे थे। उ ह ने कह दया था क उ ह चाहे समाज से हटा दया जाए, ले कन ब चे से वह माफ मंगवाने का काम नह ं करगे। क लू के अ बू ने क लू क पटाई क और उससे कहा क वह भगवान या देवी- देवता क मू त बनाना छोड़ दे। क लू मार खाता रहा और मन ह मन ण करता रहा क वह मू त बनाने का “◌ा◌ौक पूरा करता रहेगा। इस मू तकला के हुनर के कारण ह तो उसक कू ल म इ जत है, “◌ा◌ोहरत है और इसी से गु जन खुश रहते ह। मने देखा था क उस घटना के बाद से क लू उदास रहने लगा था। क लू के प रवार का सु नी मुि लम कमेट ने ब ह कार कर दया।
  • 11. अब उ ह कोई अपने दुख-सुख म बुलाता न था। इसी दर मयान क लू के अ बू मृ यु हो गई। क लू यतीम हो गया। क लू क अ मी ने सु नी मुि लम कमेट के सदर, से े टर और अ य पदा धका रय के आगे दुखड़ा रोया तब कह ं जाकर कमेट ने नणय लया क चूं क मरहूम मोह मद सल म आ तशबाज कलमागो मुसलमान था, जुमा और ईद-बकर द क नमाज अदा करता था, मि जद के लए जो भी चंदा मुकरर कया जाता, वह अदा कया करता था, इस लए उसके कफन-दफन और जनाजे क नमाज म कमेट को “◌ा◌ा मल होना चा हए। और इस तरह मरहूम आ तशबाज मोह मद सल म क मैयत म लोग इक ा हुए और कफ़न-दफन हुआ। कु रआन- वानी हुई। दसवां-चह लुम क फातेहा हुई। गर बी क मार से क लू पढ़ाई छू ट गई। क लू क अ मी चूं क आ तशबाजी के काम म हाथ बंटाती थी,सो उसने क लू से कहा क अ बू का धंधा िज दा रखा जाए। क लू को तो मू तकला से लगाव था। उसने बेमन से आ तशबाजी के काम को जार रखा और साथ ह मू तकला के हुनर म जी जान से जुट गया। हम कभी बलासपुर जाने वाल सड़क क तरफ जाते तो बंगाल मू तकार के यहां क लू को काम करता पाते। फर मेरे अ बू का कटघोरा से थाना तरण हो गया और उस जगह से हमारा स पक खतम हो गया। क वाल गा रहे थे- ‘जमाने मे कहां टूट हुई त वीर बनती है तेरे दरबार म बगड़ी हुई तकद र बनती है’ सुनने वाले दस-बीस पए के नोट क वाल क हारमो नयम पर रखते जाते। क वाल हाथ के इशारे से उ ह आदाब कहता और फर पए क तरफ देखते हुए तान खींचता।
  • 12. तभी मने देखा क क लू उफ कल म हरा चोगे म मजार से बाहर आया। उसने मुझे इशारा कया और म उठ कर उसके पीछे हो लया। हम मजार के पीछे क तरफ आए। यहां एक तरफ बड़े से चू हे म लंगर बन रहा था। चू हे क आंच से बचते हम एक कोठर म घुसे। यहां जमीन पर सफे द ग ा बछा था और गाव-त कए कर ने से रखे हुए थे। क लू बैठ गया और मुझे बैठने का इशारा कया। म उसके नजद क बैठ गया। मने मु कु राकर उससे पूछा-’’ये कै सा प ले लया भाई?’’ क लू के माथे पर चंता क लक र थीं-’’ या करता। इन कठमु ल को सबक सखाने का इसके अलावा मेरे पास कोई रा ता नह ं था।’’ ‘‘कै से?’’ मेर उ सुकता बढ़ने लगी। ‘‘अ बू क मौत के बाद अ मी भी यादा दन िज दा नह ं रह ं। उनक मौत पर फर एक बार कमेट वाल ने नौटंक क । मेरे गड़ गड़ाने पर वे कफन-दफन को राजी हुए।’’ ‘‘तुमने मू त बनाने का काम या तब भी जार रखा?’’ ‘‘हां, बंगाल आ ट ट के साथ मने खूब काम कया। बंगाल क बेट से मुझे मुह बत हो गई। बंगाल उससे मेर “◌ा◌ाद के लए तैयार हो गया। उसने अपनी बेट के धम बदलने के मामले म भी सहम त दे द । म कमेट वाल के पास गया क मेरा नकाह हो जाए, कमेट वाल ने मेर कोई मदद न क । वे मुझे ‘का फ़र’ कहने लगे।’’ क लू क आंख भर आई थीं। म चुपचाप उसक जीवन-गाथा सुन रहा था। आंख प छ कर उसने बताया-’’मने अ लाह और रसूल को हािज़र-नािज़र मानकर अपना नकाह खुद कया। मने अपनी बीवी का नाम सायरा रखा। पहले उसका नाम ेया था।’’ उसने मुंह पीछे क तरफ करके आवाज द -’’सायरा!’’
  • 13. चंद ल हे बाद सलवार-सूट म एक औरत ने परदे के पीछे से झलक दखलाई। वह एक सांवले चेहरे और बड़ी-बड़ी आंख वाल ी थी। मने क लू के पसंद क मन ह मन तार फ क । क लू ने ी से कहा-’’मेरे बचपन के दो त ह ये!’’ सायरा ने सलाम कया। मने जवाब दया-’’वा अलैकु म अ सलमाम!’’ क लू ने कहा-’’चाय तो पलाईए इ ह!’’ सायरा चल गई और क लू ने अपने बयान को अंजाम तक पहुंचाया-’’म “◌ा◌ाद के बाद घूमने नकल गया। मने कई मजार क सैर क । सभी जगह मने पाया क वहां इ लाम क रौशनी नदारत थी। था सफ और सफ अक दतमंद क भावनाओं से खेल कर पैसे कमाना। म तो सफ मू त बनाया करता था। उसे पूजता तो न था। ले कन इन जगह पर मने देखा क एक तरह से मू तपूजा ह तो हो रह है। तभी मेरे दमाग म ये वचार आया क म भी पाख ड करके देखता हूं। लौट कर जब कटघोरा आया तो मने नगर के बाहर इस थान पर बैठना “◌ा◌ु कया। हरा चोगा धारण कर लया। भं गय का मुह ला लगा हुआ है। वहां क औरत मेरे पास आने लगीं और ब च क नजर उतरवाने लगीं। म कु छ नह ं करता। बस अगरब ती क राख उन ब च के गाल पर लगा देता। उ ह यक न हो जाता और मजे क बात ये है क ब चे ठ क भी हो जाते। उ ह ं लोग ने चंदा इक ा करके मेरे लए एक कोठर बना द । सायरा मेरे पास आकर रहने लगी। फर मने जुमा क एक “◌ा◌ाम घोशणा कर द क मुझे रात वाब म पीर बाबा आए और बताया क ब चा इसी जगह मेर मजार बनाओ। मेर बात जंगल म आग क तरह फै ल और सु नी कमेट वाल ने आनन-फानन चंदा इक ा करना “◌ा◌ु कर दया।’’ म जहां बैठता था उसी से लगी थी कमेट के सदर क जमीन। उ ह ने सोचा क मजार बनने से उनक जमीन का रेट बढ़ेगा और उनका रोजगार भी फै लेगा। हुआ वह । जो कमेट मेर दु मन थी, उसने मुझे मजार का मुजाबर बना दया।’’ मुझे हंसी आ गई-’’और ये ह दू अह र वाल बात!’’
  • 14. क लू मु कु राया-’’बेरोजगार था अह र, मेरे पास आकर बैठता। गांजा पीता। फर कभी कभी झूमने लगता। मने कहा क इस पर पीर बाबा क सवार आती है। उसका भी रोजगार चल नकला। इस तरह यहां अब ह दू और मुसलमान दोन आकर म नत मांगते ह और हमार रोजी-रोट चलती है।’’ 2. यारह सत बर के बाद यारह सत बर के बाद कर मपुरा म एक ह दन ,एक साथ दो बात ऐसी हुइं, िजससे चपकू तवार जैसे लोग को बतकह का मसाला मल गया। अ वल तो ये क हनीफ ने अपनी खास मयांकट दाढ़ कटवा ल । दूजा कू प अहमद ने जुटा दया...जाने उसे या हुआ क वह दंत नपोर छोड़ प का नमाजी बन गया और उसने चकने चेहरे पर बेतरतीब दाढ़ बढ़ानी “◌ा◌ु कर द । दोन ह मुकामी पो ट-आ फस के मुलािजम। अहमद, एक ग त-◌ा◌ील युवक अनायास ह घनघोर-नमाजी कै से बना? हनीफ ने दाढ़ य कटवाई? सन ्’चैरासी के दंग के बाद स ख ने अपने के श य कु तरवाए... अहमद आज इन सवाल से जूझ रहा है। अहमद क च ताओं को कु मार समझ न पा रहा था। कल तक तो सब ठ क-ठाक था ।
  • 15. आज अचानक अहमद को या हो गया? वे दोन ढाबे पर बैठे चाय क ती ा कर रहे थे। कु मार उसे समझाना चाह रहा था -’’छोड़ यार अहमद दु नयादार को...बस ‘वेट ए ड वाच’ ...जो होगा ठ क ह होगा।’’ ‘‘वो बात नह ं है यार...कु छ समझ म नह ं आता क या कया जाए?’’---अहमद उसी तरह तनाव म था , ‘‘ जाने कब तक हम लोग को वतनपर ती का सबूत देने के लए मजबूर कया जाता रहेगा ।’’ कु मार खामोश ह रहा । वे दोनो चतीस-पतीस साल के युवक थे । कर मपुरा से दोन एक साथ पो टआ फस काम पर आते । आ फस म अ सर लोग उ ह एक साथ देख मजाक करते--’’अख ड भारत क एकता के नमूने...’’ अहमद का दमागी संतुलन गड़बड़ाने लगा। ‘‘अब मुझे लगने लगा है क म इस मु क म एक कराएदार के है सयत से रह रहा हूं, समझे कु मार...एक करायेदार क तरह...!’’ यह तो बात हुई थी उन दोन के बीच ... फर जाने य अहमद के जीवन म अचानक बदलाव आ गया? हनीफ के बारे म अहमद सोचने लगा। पो ट-आ फस क डाक थै लय को बस- टड तथा रे वे टेशन पहुंचाने वाले र ा- चालक हनीफ। बा- व त पंचगाना नमाज अदा करना और लोग म बेहद खुलूस के साथ पेश आना उसक पहचान है। पीर-बाबा क मजार पर हर जुमेरात वह फा तहा-द द पढ़ने जाता है । अहमद को अ सर धा मक मामलात म वह ◌े सलाह-मश वरा कया करता । यक न मा नए क हनीफ एक सीधा-सादा ,नेक-ब त ,द नदार या यूं कह क धम-भी क म का इंसान है। वह खामखां कसी से मसले-मसायल या क राजनी तक उथल-पुथल पर छड़ी बहस म
  • 16. कभी ह सा नह ं लेता। हां, अपने ववेक के मुता बक आड़े व त बचाव म एक मशहूर “◌ोर क पहला मसरा वह अ सर बुदबुदाया करता ---’उनका जो काम है वह अहले सयासत जाने...’ हुआ ये क यारह सत बर के बाद दु नया के समीकरण ऐसे बदले क कोई भी अपने को नरपे सा बत नह ं कर पा रहा था । सफ दो ह वक प ! अमे रका के आतंक- वरोधी काय म का समथन या वरोध...बीच का कोई रा ता नह ं । यह तो एक बात हुई । ठ क इसी के साथ दो बात गूंजी क दु नया म आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले लोग इ लामी धमावलंबी ह,दूसरा यह क इ लाम आतंकवाद धम नह ं। वह मसाल क ठ डा और गम एक साथ...तक क कोई गुंजाइश नह ं। बहुत ज दबाजी म ये बात था पत कर द गई क सार दु नया म आतंकवाद के बीज बोने वाले और संसार को चैदहवीं सद म ले जाने वाले लोग मुसलमान ह ह। अर बय -अफगा नय क तरह दाढ़ के कारण धोखे म सख पर भी अमर का म अ याचार हुए। बड़े मासूम होते ह अमर क ! वे मुसलमान और सख म भेद नह ं कर पाते। बड़े अमन-पसंद ह वे । आज उ ह कसी ने ललकारा है। अमर कय को संसार म कोई भी ललकार नह ं सकता। वे बहुत गु से म ह। इसी लए उनसे ‘ म टेक’ हो सकती है । ‘ म टेक’ पर हनीफ को याद आया... उदू म मंटो नाम का एक सर फरा कथाकार हुआ है। िजसने दंगाइय क मान सकता पर एक नायाब कहानी लखी थी। ‘ म टेक हो गया’... िजसम दंगाई धोखे म अपनी ह बरादर के एक यि त का क ल कर देते ह। अस लयत जानने पर उनम यह संवेदना फू ट --’’ क साला म टेक हो गया...’’ हनीफ ने “◌ा◌ायद इसी लए अपनी दाढ़ कटवा ल हो, क कह ं वह कसी ‘ म टेक’ का शकार न हो जाए । और इस तरह चपकू तवार जैसे लोग को बतकह का मसाला मल गया... चपकू तवार है भी गु -चीज...’ग पोलोजी’ का ोफे सर...
  • 17. खूब चुटक लेते ह पो ट-मा टर ीवा तव साहब भी। ह भी रोम के नीरो। अपनी ह धुन म मगन...चमच क एक बड़ी फौज के मा लक। कर मपुरा इस े काऐसा पो टआ फस, िजसम सालाना एक-डेढ़ करोड़ क एन.एस.सी. बेची जाती है । बचत-खाता योगदान म िजले क यह सबसे बड़ी यू नट है । इस औ यौ गक-नगर म पछले कई साल से जमे ह ीवा तव साहब। य द कभी उनका कह ं तबादला हुआ भी तो एड़ी-चोट का जोर लगाकर आदेश कवा लये। ीवा तव साहब अ सर कहा करते ---’कर मपुरा बड़ी कामधेनु जगह है...।’ सुबह-सुबह पो टआ फस म चपकू तवार और ीवा तव साहब क म डल ने अहमद का मूड-आफ कया। चपकू तवार पहले बी.बी.सी. चैनल कहलाया करता था। ले कन यारह सत बर के बाद वह ‘अल- जजीरा’ के नाम से पुकारा जाने लगा। हुआ ये क सुबह जैसे ह अहमद पो ट-आ फस म घुसा, उसे चपकू तवार क आवाज सुनाई द । वह भांज रहा था---’’अमे रका म सख के साथ गलत हो रहा है । अमे रकन ससुरे कटुवा और सख म फक नह ं कर पाते ।’’ फर कसी “◌ाडयं भनक से अहमद के कदम ठठक गए! वह थोड़ी देर ठहर गया , और क कर उनक बात सुनने लगा। ीवा तव साहब ने फकरा कसा ---’’चलो जो हुआ ठ क हुआ...अब जाकर इन मयां लोग को अपनी ट कर का आदमी भटाया है ।’’ ‘‘ हां साहब, अब लड़ ये साले मयां और इसाई ... उधर इजराइल म यहूद भी इन मयांओं को चांपे हुए ह। ‘‘ ‘‘ वो हनीफवा वाल बात जो तुम बता रहे थे ?’’--- ीवा तव साहब का न। अहमद के कान खड़े हुए। तो हनीफ भाई वाल बात यहां भी आ पहुंची । --’’ अरे वो हनीफवा... इधर अमे रका ने जैसे ड लेयर कया क लादेन ह उसका असल दु मन है,हनीफवा ने त काल अपनी दाढ़ बनवा ल । आज वो मुझे सफाचट मला तो मने उसे खूब रगड़ा। उससे पूछा क ‘का हनीफ भाई, अभी तो पटाखा फू टना चालू हुआ है...बस इतने म घबरा गए? हनीफवा कु छो जवाब नह ं दे पाया। ‘‘
  • 18. भगवान दास तार बाबू क गुट- नरपे आवाज सुनाई द । ‘‘सन चैरासी के दंग के बाद सख ने भी तो अपने के श कतरवा लए थे। जब भार उथल-पुथल हो तब यह तो होता है ।’’ अपने पीछे कु छ आवाज सुन अहमद द तर म दा खल हुआ। उसे देख बतकह बंद हुई। अहमद इसी बात से बड़ा परेशान रहता है। जाने य अपनी खुल बहस म लोग उसे “◌ा◌ा मल नह ं करते। इसी बात से उसे बड़ी को त होती। इसका सीधा मतलब यह है क लोग उसे गैर समझते ह। तभी तो उसे देखकर या तो बात का टा पक बदल दया जाएगा या क गप बंद हो जाएगी। अ सर उसे देख चपकू तवार इ लामी-तहजीब या धमशा के बारे म उ टे सीधे सवालात पूछने लगता है। आजकल क वलंत सम या से उपजे कु छ “◌ा द, िजसे मी डया बार-बार उछालता है, उसम अमर का, अल-कायदा, ओसामा बन लादेन, अफगान, पा क तान,िजहाद, तथा इ लामी फं डामटा ल म से जुडे ़ अ य अ फाज ह । इ ह ं “◌ा द क दन-रात जुगाल करता है मी डया। अहमद से चपकू तवार अपनी तमाम िज ासाएं “◌ा◌ा त कया करता। अहमद जानता है क उसका इरादा अपनी िज ासा “◌ा◌ा त करना नह ं बि क अहमद को परेशान करना है। कल ह उसने पूछा था -- ‘‘अहमद भाई ये िज़हाद या होता है ?’’ अहमद उसके सवाल से परेशान हो गया । चपकू तवार न उस समय पूछता जब ीवा तव साहब फु सत म रहते । ीवा तव साहब उसके न से खूब खुश हुआ करते । इधर अहमद इन सवाल से झुंझला जाता । वह कहता भी क उसने इ लामी धमशा का गहन अ ययन नह ं कया है। कहां पढ़ाया था म मी पापा ने उसे मदरसे म । अं ेजी और ह द मा यम से श ा हण क उसने । वह तो पापा क चलती तो उसका खतना भी न हुआ होता।
  • 19. बड़े अजीबोगर ब थे पापा। म मी और मामुओं क पहल पर उसका खतना हुआ। पापा कतने नाराज हुए थे । वह नह ं चाहते थे क उनका बेटा पर परागत मजहबी बने। वह चाहते थे क उनका बेटा इ लाम के बारे म वयं जाने और फर ववेकानुसार फे ◌ै◌ेसले करे। मुि लम प रवेश से अहमद बहुत कम वा कफ था। पापा सरकार महकमे म ‘ए’ लास आफ सर थे ...उनका उठना बैठना सभी कु छ गैर के बीच था। धा मक प से वह ईद -बकर द भर म स य रहते थे । कारण क वभागीय आला अफसरान और चहेते मातहत के लए दावत आ द क यव था करनी पड़ती थी। ‘ े स’ भी ऐसे क ईद-बकर द आ द के साथ वे अनजाने म मुहरम क भी मुबारकबाद दे दया करते। उ ह ये भी पता न होता क मुहरम एक गम का मौका होता है। म मी को पापा क ये आजाद- याल फू ट आंख न भाती । म मी उ ह समझाया करतीं। पापा हंस देते---’’आ खर व त म या ख़्◌ा◌ाक मुसलमां ह गे ।’’ वाकई वे मरने को मर गए क तु ईद-बकर द के अलावा कसी तीसर नमाज के लए उ ह समय मलना था ,न मला। उस हसाब से अहमद कु छ ठ क था। वह जुमा क नमाज अव य अदा कया करता । म मी क टोका-टाक के बाद धीरे-धीरे उसने अपनी िज दगी म यह आदत डाल । नकाह के बाद कु लसूम क खु शय के लए अ वल-आ खर रोजा भी अब वह रखने लगा था। अहमद के पापा एक आजाद याल मुसलमान थे । वह अ सर अ लामा इकबाल का एक मशहूर “◌ोर दुहराया करते ---’’ कौम या है कौम क इमामत या है। इसे या जाने ये दो रकअ़त के इमाम !’’ चूं क म मी एक प के मजहबी घराने से ता लुक रखती थीं, इस लए पापा क दाल न गल पाती । कहते ह क दादा-जान को पापा के बारे म इ म था क उनका ये बेटा मजहबी नह ं है। इस लए बहुत सोच वचार कर वे एक मजहबी घराने से बहू लाए थे, ता क खानदान म इ लामी पर पराएं जी वत बची रह । अहमद के पापा वक ल थे । वह एक कामयाब वक ल थे । काफ धन कमाया उ ह ने। कहते भी थे क अगर कह ं ज नत है तो वह झूठ के लए नह ं। इस लए वहां क ऐ-◌ा◌ो- इ-◌ारत क या लालच पाल। सारे वक ल संगी-साथी तो वहां जह नुम म मल ह जाएंगे। अ छ क पनी रहेगी। इस दल ल के साथ वह एक जोरदार ठहाका लगाया करते।
  • 20. एक सड़क हादसे म उनका इंतेकाल हुआ था। तब अहमद नातक तर क पढ़ाई कर रहा था । छ न- भ न हो गई थी िज़ दगी...। उस बुरे व त म मामुओं ने म मी और अहमद को स भाल लया था । ऐसे वतं वचार वाले पता का पु था अहमद और उसे चपकू तवार वगैरा एक कठमु ला मुसलमान मान कर सताना चाहते । इसी लए अ सर अहमद का दमाग खराब रहा करता। वह कु मार से कहा भी करता--’’ कु मार भाई , म या क ं ? तुमने देखा ह है क मेर कोई भी अदा ऐसी नह ं क लोग मुझे एक मुसलमान समझ । तुमम और मुझम कोई अ तर कर सकता है ? म न तो दाढ़ ह रखता हूं और न ह दन-रात नमाज ह पढ़ा करता हूं। तुमने देखा होगा क मने कभी सरकार अथवा ह दुओं को कोसा नह ं क इस मु क म मुसलमान के साथ अ याय कया जा रहा है। जब क उ टे मने यह पाया क मुसलमान क बदहाल का कारण उनक अ श ा और द कयानूसी-पन है। चार पैसे पास आए नह ं क खुद को नवाब “◌ाहंशाह का वंशज समझने लगगे। ब च के पास कपड़े ह या न ह । कू ल से उ ह नकाल दए जाने क नो टस मल ह ,इसक कोई च ता नह ं। सब ाथ मकताएं दर कनार...घर म बरयानी बननी ह चा हए, वरना इस कमाई का या मतलब ! ताल म के नाम पर वह मदरसे और काम के नाम पर तमाम हुनर वाले काम ! कम उ म ववाह और फर वह िज़ दगी के मसले। फर भी लोग मुझे अपनी तरह का य नह ं मानते...’’ कु मार अहमद के न को सुन चुप लगा गया। वह या जवाब देता? ठ क इसी तरह अहमद चपकू तवार के न का या जवाब देता ? वह ह दू मथक ,पुराण कथाओं ,और धम -शा के बारे म तो आ म व वास के साथ बात कर सकता था, क तु इ लामी दु नया के बारे म उसक जानकार लगभग सफर थी। ‘‘मुझे एक मुसलमान य समझा जाता है, जब क मने कभी भी तुमको ह दू वगैरा नह ं माना । मुझे एक सामा य भारतीय “◌ाहर कब समझा जाएगा?’’ अहमद क आवाज म दद था ।
  • 21. कल क तो बात है । वे दोन आदतन बस- टड के ढाबे म बैठे चाय क ती ा म थे। द तर से चुराए चंद फु सत के पल ...यह तो वह जगह है जहां वे दोन अपने दल क बात कया करते। चाय वाला चाय लेकर आ गया । अहमद क तं ा भंग हुई । अि बकापुर से सुपर आ गइर्◌्र थी । बस- टड म चहल-पहल बढ़ गई । सुपर से काफ सवा रयां उतरती ह । कर मपुर चूं क इलाके का यापा रक के है अत यहां सदा चहल-पहल रहती है। चाय का घूंट भरते कु मार ने अहमद को टोका। ‘‘तुम इतनी ज द मायूस य हो जाते हो ? या यह अ पसं यक ि थ है, िजससे मु क के तमाम अ पसं यक भा वत ह ?’’ ‘‘कै से बताऊं क बचपन से म कतना ता ड़त होता रहा हूं।’’--अहमद सोच के सागर म गोते मारने लगा। ‘‘जब म छोटा था तब सहपा ठय ने ज द ह मुझे अहसास करा दया क म उनक तरह एक सामा य ब चा नह ं, बि क एक ‘कटुआ’ हूं ! वे अ सर मेर नकर खींचते और कहते क ‘अबे साले, अपना कटा --- दखा न! पूरा उड़ा देते ह क कु छ बचता भी है ?’ कू ल के पास क मि जद से जुहर के अजान क आवाज गूंजती तो पूर लास मेर तरफ देखकर हंसती। िजतनी देर अजान क आवाज आती रहती म असामा य बना रहता। इ तहास का पी रयड उपा याय सर लया करते। जाने य उ ह मुसलमान से चढ़ थी क वे मुगल-स ाट का िज़ करते आ ामक हो जाते। उनक आवाज म घृणा कू ट-कू ट कर भर होती। उनके या यान का यह भाव पड़ता क अंत म पूर लास के ब चे मुझे उस काल के काले कारनाम का मुज रम मान बैठते।’’ कु मार ने गहरा सांस लया--’’ छोड़ो यार ... दु नया म जो फे र-बदल चल रहा है उससे लगता है क इंसान के बीच खाई अब बढ़ती ह जाएगी। आज देखो न, अफगा नय के पास रोट कोई सम या नह ं। नई सद म धमाधता, एक बड़ी सम या बन कर उभर है।’’ अहमद बेहद दुखी हो रहा था।
  • 22. कु मार ने माहौल नरम बनाने के लए चुटक ल --’’अहमद, सुपर से आज पूंछ-वाल मैडम नह ं उतर ं। लगता है उ ह मह ने के क-ट भरे तीन दन का च कर तो नह ं ?’’ पूंछ-वाल यानी क पोनी-टेल वाल आधु नका... कु मार क इस बात पर अ य दन कतनी जोर का ठहाका उठता था। अहमद क ख नता के लए या जतन करे कु मार ! चाय कब खतम हो गई पता ह न चला । ढाबे के बाहर पान गुमट के पास वे कु छ देर के । अहमद ने सगरेट पी। कु मार ने पान खाया । अहमद जब तनाव म रहता, तब वह सगरेट पीना पसंद करता। उसके सगरेट पीने का अंदाज भी बड़ा आ ामक हुआ करता । वह मु ी बांधकर उंग लय के बीच सगरेट फं सा कर ,मु ी को ह ठ के बीच टाइट सटा लेता । पूर ताकत से मुंह से भरपूर धुंआ खींचता । कु छ पल सांस अंदर रख कर धुंआं अंदर के तमाम गल -कू च म घूमने-भटकने देता । फर बड़ी नदयता से ह ठ को बचकाकर जो धुंआ फे फड़े सोख न पाए ह , उसे बाहर नकाल फकता । कु मार ने उसके सगरेट पीने के अंदाज से जान लया क आज अहमद बहुत ‘टशन’ म है। वे दोन चुपचाप पो ट-आ फस म आकर अपने-अपने जॉब म य त हो गए। अहमद को कहां पता था क उसके जीवन म इतनी बड़ी त द ल आएगी । वह तेरह सत बर क “◌ा◌ाम थी। अहमद घर पहुंचा...देखा क कु लसूम ट वी से चपक हुई है। कु लसूम पर समाचार सुन रह है। आ चय!◌़ घनघोर आ चय !!◌़ ऐसा कै से हो गया...
  • 23. अहमद सोचा, कु लसूम को समाचार चैनल से कतनी नफरत है। वह अ सर अहमद को टोका करती --’’जब आप अखबार पढ़ते ह ह, तब आपको समाचार सुनने क या ज रत...इससे अ छा क आप कोई धारावा हक ह देख लया कर। पूरा दन एक ह खबर को घसीटते ह ये समाचार चैनल...िजस तरह एक बार खाने के बाद भस जुगाल करती है । जाने कहां से इनको भी आजकल इतने ढेर सारे ायोजक मल जा रहे ह । ‘‘ अहमद या बताता। उसे मालूम है क खाते-पीते लोग के लए आजकल समाचार क या अह मयत है । अहमद जानता है क समकाल न घटनाओं और उथल-पुथल से कटकर नह ं रहा जा सकता । यह सूचना- ाि त का दौर है। कर मपुरा के अ य मुसलमान तरह उसे अपना जीवन नह ं गुजारना। वह नए जमाने का एक सजग, चेतना-स प न युवक है। उसे मूढ़ बने नह ं रहना है। इसी लए वह ह द अखबार पढ़ता है। ह द म थोड़ी बहुत सा हि यक अ भ यि तयां भी कर लेता। अहमद जानता है क मी डया आजकल नई से नई खबर जुटाने म कै सी भी ‘ए सरसाइज’ कर सकता है । चाहे वह डायना क मृ यु से जुड़ा संग हो ,नेपाल के राज प रवार के जघ य ह याका ड का मामला हो , तहलका-ताबूत हो या क मौजूदा अमर क संकट...अचार, तेल, साबुन, जूता-च पल, गहना- जेवर, काम-शि त वधक औश धय और गभ- नरोधक आ द के उ पादक एवम ् वतरक से भरपूर व ापन मलता है समाचार चैनल को। यह कारण है क समाचार चैनल आजकल अ य चैनल से अ धक मुनाफा कमा रहे ह। कु लसूम यूज सुनने म इतनी मगन थी क उसे पता ह न चला क अहमद काम से वापस आ गया है। कु लसूम बीबीसी के समाचार बुले टन सुन रह थी। न पर ओसामा बन लादेन क त वीर उठाए पा क तानी नौजवान के जुलूस पर पु लस ताबड़-तोड़ लाठ चला रह है। अमर क ेसीडट बुश और लादेन के चेहरे का मला जुला कोलाज इस तरह बनाया गया था क ये जो लड़ाई अफगान क धरती पर लड़ी जानी है वह दो आद मय के बीच क लड़ाई हो। सनसनीखेज समाचार से भरपूर वह एक बड़ा ह खतरनाक दन था। अहमद कु लसूम क बगल म जा बैठा । कु लसूम घबराई हुई थी। ऐसे ह बाबर -मि जद व वंस के समय कु लसूम घबरा गई थी।
  • 24. आज भी उसका चेहरा याह था । कु लसूम कसी गहन चंता म डूबी हुई थी । अहमद ने ट वी के न पर नजर गडऱ्◌ाइं। वहां उसे बुश-लादेन क त वीर के साथ चपकू तवार और ीवा तव साहब के खि लयां उड़ाते चेहरे नजर आने लगे। उसे महसूस हुआ क चार तरफ चपकू तवार क सरगो शयां और कहकहे गूंज रहे ह। अहमद का दमाग चकराने लगा । जब कु लसूम ने अहमद क देखा तो वह घबराकर उठ खड़ी हुई । उसने त काल अहमद को बाह का सहारा देकर कु स पर बठाया। फर वह पानी लेने कचन चल गई। पानी पीकर अहमद को कु छ राहत मल । उसने कु लसूम से कहा---’’जानती हो ...सन्◌् चैरासी के दंग के बाद अपने पुराने मकान के सामने रहने वाले सख प रवार के तमाम मद ने अपने के श कु तरवा लए थे। ‘‘ कु लसूम क ◌े समझ म कु छ न आया। फर भी उसने प त क हां म हां मलाई---’’हां , हां, परमजीते के भाई और बाप दाढ़ -बाल बन जाने के बाद पहचान ह म न आते थे ?’’ ‘‘बड़ी थू-थू मची है कु लसूम चार तरफ...हर आदमी हम लादेन का हमायती समझता है। हम उसक लाख मज मत कर कोई फक नह ं पड़ता। ‘‘ अहमद क आवाज हताशा से लबरेज थी। अचानक अहमद ने कु लसूम से कहा--’’ मग रब क नमाज का व त हो रहा है। मेरा पैजामा-कु ता और टोपी तो नकाल दो।’’ कु लसूम चक पड़ी। आज उसे अपना अहमद डरा-सहमा और कमजोर सा नजर आ रहा था। 3 गहर जड़
  • 25. असगर भाई बड़ी बेचैनी से जफर क ती ा कर रहे ह। जफर उनका छोटा भाई है। उ होन सोच रखा है क वह आ जाए तो फर नणय ले ह लया जाए, ये रोज-रोज क भय- च ता से छु टकारा तो मले ! इस मामले को यादा दन टालना अब ठ क नह ं। कल फोन पर जफर से बहुत देर तक बात तो हुई थीं। उसने कहा था क ---’भाईजान आप परेशान न ह , म आ रहा हूं।’ असगर भाई ‘हाईपर-टशन’ और ‘डाय बट ज’ के मर ज ठहरे। छोट -छोट बात से परेशान हो जाते ह। मन बहलाने के लए जफर बैठक म आए। मुनीरा ट वी देख रह थी। जब से ‘गोधरा - करण’ चालू हुआ, घर म इसी तरह ‘आज-तक’ और ‘ टार- लस’ चैनल को बार -बार से चैनल बदल कर घंट से देखा जा रहा था। फर भी चैन न पड़ता था तो असगर भाई रे डयो- ांिज टर पर बीबीसी के समाचार से देशी मी डया के समाचार का तुलना मक अ ययन करने लगते। तमाम चैनल म नंगे-नृशंस यथाथ को दशक तक पहुंचाने क होड़ सी लगी हुई थी। मुनीरा के हाथ से असगर ने रमोट लेकर चैनल बदल दया। ‘ ड कवर -चैनल’ म हरण के झु ड का शकार करते “◌ोर को दखाया जा रहा था। “◌ोर गुराता हुआ हरण को दौड़ा रहा था। अपने ाण क र ा करते हरण अंधाधुंध भाग रहे थे। असगर भाई सोचने लगे क इसी तरह तो आज डरे-सहम लोग गुजरात म जान बचाने के लए भाग रहे ह। उ होन फर चैनल बदल दया। नजी समाचार-चैनल का एक य कै मरे का सामना कर रहा था। कांच क बोतल से पे ोल-बम का काम लेते अहमदाबाद क बहुसं यक लोग और वीरान होती अ पसं यक आबा दयां। भीड़-तं क बबरता को बड़ी ढ ठता के साथ ‘सहज- त या’’ बताता एक
  • 26. स ता-पु श। टेल वजन पर चलती ढ ठ बहस क रा य पु लस को और मौका दया जाए या क सेना ‘ ड लाय’ क जाए । स ता-प और वप के बीच मृतक-सं या के आंकड़ पर उभरता तरोध। स ता-प क दल ल क सन ् चैरासी के क लेआम से ये आंकड़ा काफ कम है। उस समय आज के वप ी तब के म थे और कतनी मासू मयत से यह दल ल द गई थी -- ‘‘ एक बड़ा पेर गरने से भूचाल आना वाभा वक है।’’ इस बार भूचाल तो नह ं आया क तु यूटन क ग त के तृतीय नयम क धि जयां ज र उड़ाई गइं। ‘ या के वपर त त या...’’ असगर भाई को हंसी आ गई। उ होन देखा ट वी म वह संवाददाता दखाई दे रहे थे जो क कु छ दन पूव झुलसा देने वाल गम म अफगा न तान क पथर ल गुफाओं, पहाड ◌़ और यु के मैदान से ता लबा नय को खदेड़ कर आए थे, और बमुि कल तमाम अपने प रजन के साथ चार-छह दन क छु यां ह बता पाए ह गे क उ ह पुन एक नया ‘टा क’ मल गया। अमे रका का र त-रंिजत तमाशा, लाश के ढेर, राजनी तक उठापटक, और अपने चैनल के दशक क मान सकता को ‘कै श’ करने क यवसा यक द ता उन संवाददाताओं ने ा त जो कर ल थी। असगर भाई ने यह वड बना भी देखा◌ी क कस तरह नेतृ व वह न अ पसं यक समाज क व वसंक ओसामा बन लादेन के साथ सुहानुभू त बढ़ती जा रह थी। जब क ‘डब यू ट ओ’ क इमारत सफ अमर का क बपौती नह ं थी। वह इमारत तो मनु य क मेधा और वकास क दशा का जीव त तीक थी। िजस तरह से बा मयान के बु एक पुराताि वक धरोहर थे। ‘डब यू ट ओ’ क इमारत म काम करने का व न सफ अमर क ह नह ं बि क तमाम देश के नौजवान नाग रक देखा करते ह। बा मयान करण हो या क यारह सत बर क घटना, असगर भाई जानते ह क ये सब गैर-इ ला मक कृ त ह, िजसक दु नया भर के तमाम अमनपसंद मुसलमान ने कड़े “◌ा द म न दा क थी।
  • 27. ले कन फर भी इ लाम के दु मन को संसार म म फे लाने का अवसर मल आया क इ लाम आतंकवाद का पयाय है। असगर भाई को बहुसं यक हंसा का एकतरफा ता डव और “◌ा◌ासन- शासन क चु पी देख और भी नराशा हुई थी। ऐसा ह तो हुआ था उस समय जब इं दरा गांधी का मडर हुआ था। असगर तब बीस-इ क स के रहे ह गे। उस दन वह जबलपुर म एक लॉज म ठहरे थे। एक नौकर के लए सा ा कार के सल सले म उ ह बुलाया गया था। वह लॉज एक सख का था। उ ह तो खबर न थी क देश म कु छ भयानक हादसा हुआ है। वह तो तयो गता और सा ा कार से स बं धत कताब म उलझे हुए थे। “◌ा◌ाम के पांच बजे उ ह कमरे म धूम-धड़ाम क आवाज सुनाई द ं। वह कमरे से बाहर आए तो देखा क लॉज के रसे शन काउ टर को लाठ -डंडे से लैस भीड़ ने घेर रखा था। वे सभी लॉज के सख मैनेजर करनैल संह से बोल रहे थे क वह ज द से ज द लॉज को खाल करवाए, वरना अ जाम ठ क न होगा। मैनेजर करनैल संह घ घया रहा था क टेशन के पास का यह लॉज मु त से परदे सय क मदद करता आ रहा है। वह बता रहा था क वह सख ज र है क तु खा ल तान का समथक नह ं। उसने यह भी बताया क वह एक पुराना कां ेसी है। वह एक िज मेदार ह दु तानी नाग रक है। उसके पूवज ज र पा क तानी थे, ले कन इस बात म उन बेचार का दोश कहां था। वे तो धरती के उस भूभाग म रह रहे थे जो क अख ड भारत का एक अंग था। य द त काल न आकाओं क राजनी तक भूख नयं त रहती तो बंटवारा कहां होता ?
  • 28. कतनी तकल फ सहकर उसके पूवज ह दु तान आए। कु छ करोलबाग द ल म तथा कु छ जबलपुर म आ बसे। अपने बखरते वजूद को समेटने का पहाड़- यास कया था उन बुजुग ने। “◌ारणाथ मद-औरत और ब चे सभी मलजुल, तनका- तनका जोड़कर आ शयाना बना रहे थे। करनैल संह रो-रोकर बता रहा था क उसका तो ज म भी इसी जबलपुर क धरती म हुआ है। भीड़ म से कई च लाए--’’मारो साले को...झूट बोल रहा है। ये तो प का आतंकवाद है।’’ उसक पगड़ी उछाल द गई। उसे काउ टर से बाहर खींच गया। जबलपुर वैसे भी मार-धाड़, लूट-पाट जैसे ‘माशल-आट’ के लए कु यात है। असगर क समझ म न आ रहा था क सरदारजी को काहे इस तरह से सताया जा रहा है। तभी वहां एक नारा गूंजा-- ‘‘ पकड़ो मार साल को इं दरा मैया के ह यार को!’’ असगर भाई का माथा ठनका। अथात धानमं ी इं दरा गांधी क ह या हो गई ! उसे तो फिज स, के म , मैथ के अलावा और कोई सुध न थी। यानी क लॉज का नौकर जो क ना ता-चाय देने आया था सच कह रहा था। देर करना उ चत न समझ, लॉज से अपना सामान लेकर वह त काल बाहर नकल आए। नीचे अ नयं त भीड़ स य थी। सख क दुकान के “◌ा◌ीशे तोड़े जा रहे थे। सामान को लूटा जा रहा था। उनक गा ड़य म, मकान म आग लगाई जा रह थी। असगर भाई ने यह भी देखा क पु लस के मु ी भर सपाह तमाशाई बने नि य खड़े थे। ज दबाजी म एक र ा पकड़कर वह एक मुि लम बहुल इलाके म आ गए।
  • 29. अब वह सुर त थे। उसके पास पैसे यादा न थे। उ ह पर ा म बैठना भी था। पास क मि जद म वह गए तो वहां नमािज़य क बात सुनकर दंग रह गए। कु छ लोग पेश-इमाम के हुजरे म बीबीसी सुन रहे थे। बात हो रह थीं क पा क तान के सदर को इस ह याका ड क खबर उसी समय मल गई, जब क भारत म इस बात का चार कु छ देर बाद हुआ। ये भी चचा थी क फसादात क आंधी “◌ाहर से होती अब गांव-गल -कू च तक पहुंचने जा रह है। उन लोग से जब उ ह ने दरया त क तो यह सलाह मल --’’बरखुरदार! अब पढ़ाई और इ तेहानात सब भूलकर घर क राह पकड़ लो, य क ये फसादात खुदा जाने जब तक चल। बात उनक समझ म आई। वह उसी दन घर के लए चल दउ । रा ते भर उ ह ने देखा क िजस लेटफाम पर गाड़ी क सख पर अ याचार के नशानात साफ नजर आ रहे थे। उनके अपने नगर म भी हालात कहां ठ क थे। वहां भी सख के जान-माल को नशाना बनाया जा रहा था। ट वी और रे डयो से सफ इं दरा-ह याका ड और खा ल तान आंदोलन के आतंकवा दय क ह बात बताई जा रह थीं। लोग क स वेदनाएं भड़क रह थीं। खबर उठतीं क गु वारा म सख ने इं दरा ह याका ड क खबर सुन कर पटाखे फोड़े और मठाईयां बांट ं ह। अफवाह का बाजार गम था। दंगाईय -बलवाइय को डेढ़-दो दन क खुल छू ट देने के बाद शासन जागा और फर उसके बाद नगर म क यू लगाया गया।
  • 30. य द वह धनौनी हरकत कह ं मुि लम आतंकवा दय ने क होती तो ? उस दफा सख को सबक सखाया गया था। इस बार... जफर आ जाएं तो फै सला कर लया जाएगा। जैसे ह असगर भाई कु छ समथ हुए, उ ह ने अपना मकान मुि लम बहुल इलाक म बनवा लया था। जफर तो नौकर कर रहा है क तु उसने भी कह रखा है क भाईजान मेरे लए भी कोई अ छा सा स ता लॉट देख र खएगा। अब अ बा को समझाना है क वे उस भूत-बंगले का मोह याग कर चले आएं इसी इ ाह मपुरा म। इ ाह मपुरा ‘ मनी-पा क तान’ कहलाता है। असगर भाई को यह तो पसंद नह ं क कोई उ ह ‘पा क तानी’ कहे क तु इ ाह मपुरा म आकर उ ह वाकई सुकू न हा सल हुआ था। यहां अपनी हुकू मत है। गैर दब के रहते ह। इ मीनान से हरेक मजहबी तीज- योहार का लु फ उठाया जाता है। रमजान के मह ने म या छटा दखती है यहां। पूरे मह ने उ सव का माहौल रहता है। चांद दखा नह ं क हंगामा “◌ा◌ु हो जाता है। ‘तरावीह’ क नमाज म भीड़ उमड़ पड़ती है। यहां साग-स जी कम खाते ह लोग य क स ते दाम म बड़े का गो त जो आसानी से मल जाता है। फ़जा म सु हो-शाम अजान और द दो-सलात क गूंज उठती रहती है। ‘शबे-बरात’ के मौके पर थानीय मजार “◌ार फ म गजब क रौनक होती है। मेला, मीनाबाजर लगता है और क वाल के “◌ा◌ानदार मुकाबले हुआ करते ह। मुहरम के दस दन “◌ाह दाने-कबला के गम म डूब जाता है इ ाह मपुरा ! सफ मयांओं क तूती बोलती है यहां। कसक मजाल क आंख दखा सके । आंख नकाल कर हाथ म धर द जाएंगी। एक से एक ‘ ह -शीटर’ ह यहां।
  • 31. अरे, खालू का जो तीसरा बेटा है यूसुफ वह तो जाफरानी-जदा के ड बे म बम बना लेता है। बड़ी-बड़ी राजनी तक हि तयां भी ह िजनका संर ण इलाके के बेरोजगार नौजवान को मला हुआ है। असगर भाई को च ता म डूबा देख मुनीरा ने ट वी ऑफ कर दया। असगर भाई ने उसे घूरा-- ‘‘ काहे क च ता करते ह आप...अ लाह ने िज़ दगी द है तो वह पार लगाएगा। आप के इस तरह सोचने से या दंगे-फसाद ब द हो जाएंगे ?’’ असगर भाई ने कहा--’’ वो बात नह ं, म तो अ बा के बारे म ह सोचा करता हूं। कतने िज़ ी ह वो। छोड़गे नह ं दादा-पुरख क जगह...भले से जान चल जाए।’’ ‘‘ कु छ नह ं होगा उ ह, आप खामखां फ़ कया करते ह। सब ठ क हो जाएगा।’’ ‘‘खाक ठ क हो जाएगा। कु छ समझ म नह ं आता क या क ं ? बुढ़ऊ स ठया गए ह और कु छ नह ं । सोचते ह क जो लोग उ हे◌े सलाम कया करते ह मौका आने पर उ ह ब श दगे। ऐसा हुआ है कभी। जब तक अ मा थीं तब तक ठ क था अब वहां या रखा है क उसे अगोरे हुए ह।’’ मुनीरा या बोलती। वह चुप ह रह । असगर भाई मृ त के सागर म डूब-उतरा रहे थे। अ मा बताया करती थीं क सन इकह तर क लड़ाई म ऐसा माहौल बना क लगा उजाड़ फकगे लोग। आमने-सामने कहा करते थे क हमारे मुह ले म तो एक ह पा क तानी घर है। चींट क तरह मसल दगे। ‘‘चींट क तरह...हुंह..’’ असगर भाई बुदबुदाए। कतना घबरा गई थीं तब वो। चार ब च को सीने से चपकाए रखा करती थीं।