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Yog aur swasthya

  1. 1. यययोोोगगग औऔऔररर स्स्स्वववााास्स्स््््ययय
  2. 2. योग और स्वास््य स्वास््य का मतलब क्या है ? यह समजने के ललए हमे स्वास््य यह शब्द का अर्थ समझना होगा | स्व - याने हम खुद | (स्वयं) स्र् - याने लस्र्र होना |  याने स्वयं में लस्र्र होना |  क्या हम लस्र्र है ?
  3. 3. योग और स्वास््य WHO द्वारा की गई व्याख्या – स्वास््य के वल रोगोंका अभाव नहीं. बलकक शारीररक, मानलसक, आध्यालममक और सामालजक सुलस्र्लत याने स्वास््य |
  4. 4. योग और स्वास््य  अब सवाल यह है की, क्या हम स्वस्थ है ?  हमारा स्वास््य ठीक क्यों नहीं है ?  इसका कारण है- हमारी आधुननक जीवनशैली और भागदौड़ भरी नजिंदगी|  इसका पररणाम - कई मनोकानयक रोग : निप्रेशन, िायनबटीस, ब्लि प्रेशर इन रोगोंका सामना करना पड़ता है | साथ - साथ शारीररक दुबबलता, शरीर का लचीलापन कम होता है| थकान मेहसुस होती है |  इसके कारण हमने स्वयिं की लस्र्रता खो दी है |  अगर हमें इनसे बचना है, तो उसके नलए उत्तम मागब है योग|
  5. 5. योग और स्वास््य योग अनुसार स्वास््य के दो मुख्य घटक है | स्वास््य १) शारीररक २) मानलसक आहार लवहार लवश्ांलत लवकार लवचार लववेक
  6. 6. योग और स्वास््य शारीररक आहार लवहार लवश्ांलत आहार - हमारे शरीर का स्वास््य बहेतर रखने के ललए आहार की भूलमका सबसे महमव पूणथ है |अलिक मात्रा और अयोग्य आहार से हमारा स्वास््य लबगड़ता है | इसललए हमें सालमवक, सीलमत और संतुललत आहार लेना चालहए |
  7. 7. योग और स्वास््य लवहार - लवहार का मतलब है, शारीररक स्वास््य और स्वास््य संविथन के उद्देश्य से की गई शारीररक लियाए/ हलन - चलन | लेलकन इस हलन चलन में अगर आनंद प्रालि का भी उद्देश्य हो तो इसे लवहार कहते है| लवश्ांलत - लवश्ांलत में लनद्रा का समावेश होता है | लनंद्रा से हमारे शरीर और मन को लवश्ांलत लमलती है | हम अपने जीवन में लजस प्रमाण में क्ट, श्म करते है | मुसीबतों का सामना करते है , उसी प्रमाण में हमें लवश्ांलत लेनी चालहए |
  8. 8. योग और स्वास््य मानलसक लवकार लवचार लववेक लवकार - लवकार याने शारीररक और मानलसक स्तरों का रोग | यहााँलवकार का अर्थ है - मनोकालयक व्यािी या मनोलवकार | इसके कारण है - िोि, द्वेश, ममसर, बुरे लवचार, अलत कामवासना इनके अलतरेक से हमारा मानलसक स्वास््य पूरी तरह लबगड़ता हैऔर हम मनोकालयक व्यलियोसे ग्रस्त हो जाते है|
  9. 9. योग और स्वास््य लवचार - अलत लवचार, अयोग्य लवचार, बुरे लवचार , गलत लवचार इनसे भी हमारा मानलसक स्वास््य लबगड़ता है | गर, हम अपने जीवनमें सकाराममक द्रल्टकोन अपनाएंगे तो हम अनेक लवकारो सेदूर होकर लववेक की और जा सकते है| लववेक - संयम, संतुलन, बंिन, लनयंत्रण याने लववेक, लेलकन लववेकशून्य वतथन हमारा मानलसक और सामालजक स्वास््य लबगाड़ता है | इसललए हमे समाजमे रहते हुए और दैलनक जीवनमे लववेक बुलि अपनानी चालहए |
  10. 10. योग और स्वास््य योग द्वारा उत्तम स्वास््य योग में की जानेवाली लियाए  आसन - आसनों द्वारा हमारा शारीररक स्वास््य सुिरता है| शरीर में लचीलापन आता है | मांसपेलशयां मजबूत होती है | और शरीर में लस्र्रता प्राि होती है|  प्राणायाम - प्राणायाम से हम श्वसन द्वारा मनोलनयंत्रण प्राि करते है लजसके कारण हमे मानलसक स्वास््य और मानलसक संतुलन प्राि होता है|  शुलिलिया - इन लियाओ ंसे हमारे शरीर कीआंतररक शुलि होती है| और हमारा आंतररक स्वास््य सुिरता है|
  11. 11. योग और स्वास््य  त्राटक - इस लियासे हमारे मनकी चंचलता कम होकर हमारी एकाग्रता बढ़ती है| मनके लवचार कम होते है| बुलि का लवकास होता है| स्मरणशलति बढ़ती है|  लशलर्लीकरण - (शवासन) इससे हमारे शरीर और मनका स्वास््य बना रहता है | हम कई मनोकालयक रोगोसे मुलति पा सकते है | यही एक कम अंतर का रास्ता है जो हमे तनावयुति जीवनसे- तनावमुति जीवन की और ले जाता है|  मुद्रा और बंि - इन लियाओ से हमारी अन्तःस्त्रावी (इंडोिाइन ग्लेंड्स ) ग्रंलर्यों पर उत्तम कायथ होता है| इन ग्रंलर्यों का गहरा संबंि हमारे मानलसक स्वास््य से होता है | इनके लनरंतर अभ्यास से हम, हमारे शरीर में जो सुिशलति यााँ है, उन्हें जागृत कर सकते है | और सार् - सार् आध्यामम की और बढ़ सकते है |
  12. 12. योग और स्वास््य आयुवेद आयुवेद मे भी उत्तम स्वास््य के लवषय में यही कहा गया है की, समदोषा: समालग्नश्च समिातु मललिया: | प्रसन्नाममेंलद्रयामन: स्वस्र् इमयलभलियते || अर्ाथत - शारीररक स्वास््य के सार्-सार् हमारे आममा, इलन्द्रय और मन इनकी प्रसन्नता ही उत्तम स्वास््य है |
  13. 13. सारांश हमे सुखमय जीवन जीने की ललए उत्तम स्वास््य की आवश्यकता होती है | यह स्वास्स््य हम योग द्वारा प्राि कर सकते है | योगमे आहार को बहुत महमव लदया गया है | इस लवषय में बहुत कहा भी गया है | सालमवक, लसलमत और संतुललत आहार से हमे न की लसर्थ शारीररक स्वास््य प्राि होता है, बलकक इसका गहरा प्रभाव मानलसक स्वास््य और हमारी भावनाओ ंपर भी होता है | इसललए कहा गया है “यर्ा अन्न तर्ा मन:”
  14. 14. सारांश आसन, प्राणायाम और अन्य लियाए करते समय जब मन इन लियाओ के सार् जुड़ जाता है तब हमे आनंद प्राि होता है इसे ही हम लवहार कहते है | शवासन से उत्तम प्रकार लशलर्लीकरण होकर लवश्ांलत प्राि होती है | योग सािना और समसंग द्वारा लवकारों का प्रमाण कम होकर, हमारे लवचार उलचत, सही और सकराममक होने लगते है | “जैसे लवचार वैसाही आचार” याने इस तरह से हमारे आचार और स्वभाव में भी पररवतथन होता है | और हम लववेकशील बनते है |
  15. 15. सारांश इसतरह लनयलमत, लनरंतर और उलचत योगसािना करने से हमे शारीररक एवं मानलसक स्वास््य की प्रालि होती है| और हमारा स्वास््य संविथन होता है| हमे जीवनमे सर्लता और संतुल्ट प्राि होती है | योग द्वारा प्राि लकया हुआ स्वास््य ही मानव की संपलत है, और इस संपलत का नाम है “संतोष” | || हरी ॐ तमसत् ||

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