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Kusani

14 de Mar de 2019
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Jageshwar dham yatra Jageshwar dham yatra
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  1. कौसानी - स्विट्ज़रलैंड ऑफ़ इंडडया जैसा डक मैंने अपने आस्विरी पोस्ट में बताया था डक हमने देहरादू न से जागेश्वर धाम की यात्रा की थी। आज मै आपको अपनी आगे की यात्रा के बारे में बताता हूँ । हम उसके बाद अल्मोड़ा के डलए रवाना हुए, 2-3 घण्टे बाद हमने अपने कदम अल्मोड़ा में, रिे हल्की -हलकी बाररश हो रही थी। अल्मोड़ा में आने के बाद हम वहां के मॉल रोड की सड़क पर डमठाई की दुकानों पर घूमने के बाद हम दोनों ने कौसानी जाने के डलए मन बनाया और आगे बढे। मेरे दोस्त को उसके बारे में थोड़ी जानकारी थी, पर मैंने उस जगह के बारे में थोड़ा बहुत पढ़ा था। मैंने कौसानी के बारे में इतना पढ़ा था के उसे स्विट्ज़रलैंड ऑफ़ इंडडया के नाम से जाना जाता है, कौसानी उत्तरािंड राज्य के बागेश्वर डजले में स्वथथत है, और वहां महात्मा गाूँधी जी ने एक आश्रम की थथापना की थी और स्विट्ज़रलैंड ऑफ़ इंडडया का नाम महात्मा गाूँधी जी ने ही कौसानी को डदया था। Himalya view from Gandhi Aashram[/caption] हमने अपनी आगे की यात्रा के बारे में वहां के लोगो से बातचीत की ,उन्ोंने हमे बताया डक वहां रुकने के डलए होटल और लॉज की व्यवथथा डमलती है। डिर उन्ोंने हमे वहां जाने का चाजज बताया 1200 रूपए जाने के डलए और अगर आप उसी टैक्सी में वापस आते है तो हम आपसे 2000 रूपए लेंगे, वहां के डजतने भी घूमने वाली जगह है उन्ोंने हमे वहां ले जाने के बारे में भी बताया। मैंने और मेरे दोस्त ने पूछा यहां से डकतना दू र है और डकतना समय लगेगा, उन्ोने बताया वहां जाने में लगभग 2 -3 घंटे का समय लगता है। हमने अपनी घडी में समय देिा 1:35 PM हो चुके थे मतलब हम शाम तक वहां पहुंचेंगे। अल्मोड़ा से कौसानी की दुरी 55 KM के लगभग है। हमे टैक्सी का डकराया थोड़ा ज्यादा लग रहा था हमने सोचा थोड़ा काम हो जाये तो कु छ अच्छा रहेगा ,तभी संयोग से एक टैक्सी वाले भाई साब पास से गुजरे ,व्यवहार से वो बहुत अच्छे और सज्जन लगे तो हमने उनसे बात की और उन्ोंने बोलै के आप 800 रूपए दे देना मै आपको कौसानी ले चलूूँगा। हमने भी ज्यादा समय नहींगवाया और टैक्सी में बैठ गए। हमने रास्ते में िाने के डलए अंगूर और संतरे ले डलए और डिर हम अल्मोड़ा टैक्सी स्टैंड से कौसानी की और चल डनकले। तब तक थोड़ी धुप डनकल आयी थी परन्तु उसका सदी पर कोई असर नहींहो रहा था।
  2. Way to kausani कु छ समय बीतने के बाद हम कौसानी से 10 KM दू र रह गए थे। जैसे जैसे हम करीब आते जा रहे थे मन उत्सुक था डमनी स्विट्ज़रलैंड देिने को,मन में बहुत सरे ख्याल घूम रहे थे कौसानी के बारे में। सोच रहा था डकतने भाग्यशाली है वो लोग जो शहर की भीड़ भाड़ वाली डजंदगी से दू र इस एकांत में रहते है, थोड़ा सुि सुडवधाओं का आभाव जरूर है परन्तु इतनी शांडत भरी डजंदगी ये लोग जीते है। ऊपर पहाड़ से डनचे आना जाना मतलब इतने एस्विव और मेहनती लोग यहां रहते है। ऐसे ख्याल मन में आ ही रहे थे के हम पहाड़ से डनचे ढलान की और जाने लगे और जैसे ही ढलान ित्म हुई मेरी आंिों के सामने क्या सुन्दर नजारा था। नीला नीला आसमान और उसमे सफ़े द रंग के हल्के हल्के बादल ,थोड़े ऊूँ चे डबलकु ल हरे भरे पहाड़ और पहाड़ो के पास से बहती हुई साफ़ पानी की नदी,नदी के पास कािी दू र तक िै ले बाहार डनकलते ही वहां की िूबसूरत वाडदयोंने हमारा मन मोह डलया, पहाड़ पर हरे रंग की मिमली घास और ऊूँ चे ऊूँ चे चीड़ के पेड़ अलग ही सौंदयज डबिेर रहे थे। डशवराडत्र का डदन तो पुरे अल्मोड़ा में जगह जगह भीड़ थी। लोग डदन भर मंडदर में आ जा रहे थे। अल्मोड़ा से कु छ दू र जाने पर सड़क डकनारे हमे बहुत बड़ा मेला डदिाई पड़ा ,उस जगह का नाम हमने डर ाइवर से पूछा उसने बताया यहां डशवजी का अच्छा मंडदर है और इस जगह का नाम देवथथल है। सड़क के दोनों और दुकाने लगी थी ,सड़क पर बहुत भीड़ थी तो हम धीरे धीरे व्हा से लगभग 15-20 डमनट में डनकल कर आगे चले गए। चारो और ऊूँ चे ऊूँ चे पहाड़ और पहाड़ के बीच से बहती नदी। सड़क कही कही पर थोड़ी टू टी हुई थी पर हमे कु छ ज्यादा डदक्कत नहींहुई। थोड़ा और चलने के बाद एक जगह और मेला डदिाई डदया उसक जगह का नाम सोमेश्वर था। वहां पर भी बड़ा डशव मंडदर था तो इसडलए वहां भी कािी भीड़ लगी थी, लगभग हर चीते बड़े गांव में मेला लगा था। हुए सरसो के पीले-पीले िेत ऐसा लग रहा था मनो यही िगज है। उस नदी के पानी की आवाज अलग ही गीत गए रही थी,िू लो की िुसबू और हररयाली ने मन में डिर से ताजगी भर दी। कु छ पल के डलए मनो मई ठहर सा गया था। प्रकृ डत ने भी धरती का क्या शश्रृंगार डकया था, उसको शब्ों में बता पाना बहुत मुस्विल है। हम गाडी से बाहर आये और वहां के उस िूबसूरत पलो को हमने अपने मोबाइल के कमरे में कै द कर डलया।
  3. Someshwar शाम के 4 बज चुके थे हम अभी भी कौसानी से 6-7 Km दू र थे। तभी हमारा डर ाइवर जो एक एक भला इंसान था उसने हमे चलने को कहा, हमने भी उसकी बात मान ली, मै और मेरा दोस्त दोनों गाडी में बैठ गए और डिर हम कौसानी की और चल पड़े। हम चल तो रहे थे पर यह नजर मेरी आूँिों से मेरे डदल में उतर गया था। वो िूबसूरती आूँिों के आगे आगे आज भी घूमती है। कु छ समय बाद हम आडिरकार कौसानी में आ ही गए। यह सहर मुझे कु छ ज्यादा बड़ा नहींलग रहा था। एक छोटे से चौक पर जोडक कौसानी का मेन चौराहा था हम वहां उतर गए। बाररस डिर से होने लगी थी ,डिर हमे व्हा कु छ साधन नजर नहींआया हम दोनों शहर से अनजान थे कहाूँ जाते डकस से क्या पूछते समझ नहींआ रहा था। मेरा दोस्त बोला देि भाई यहां रहने लायक मुझे कु छ लग तो नहींरहा ऐसा करते है अूँधेरा होने से पहले घूम लेते है डिर वापस अल्मोड़ा चले जायेंगे अभी भी जाना है और सुबह भी मैंने भी उसकी बातो में हाूँ डमला दी। हमारे डर ाइवर का नाम अनु डसंह था हमने उसे बुलाया और पूछा के क्या सही रहेगा उसने बोला देिो सर ! मै आपको यहां रुकने की सलाह तो नहींदूंगा भले आप दू सरी टैक्सी में चले जाओ क्योंडक यहां 3-4 जगह है जहां आप घूम सकते हो, वो मै आपको अगले 2 घंटे में सारा घुमा दूंगा अच्छे से, हमे उसकी बात सही लगी और उससे जाने के बारे में पूछा के या चाजज लोगे जाने का उसने बोला सर आने का 800 रूपए डदया है जाने का 600 रूपए दे देना , हमने भी उसकी बात मान ली। वहां से हम आगे घूमने डनकले।घूमने के डलए कौन कौन सी जगह थी, मै आपको डवस्तार से बताता हूँ।
  4. अनासस्वि आश्रम (गाूँधी आश्रम )-उत्तरािंड राज्य के बागेश्वर डजले में एक छोटा सा गांव है कौसानी ,यह वही कौसानी है जहां महात्मा गाूँधी जी 2 हफ्ते के डलए रुके थे। गाूँधी जी उस समय डवश्व व्यापी दौरे पर डनकले थे और यहां दो डदन के डलए रुके थे, परन्तु यहां की िूबसूरती ने उनका मन मोह डलया और उनको दो सप्ताह तक रुकने के डलए डववश कर डदया था। गाूँधी जी सन 1929 में कौसानी आये थे यही रह कर उन्ोंने गीता पर आधाररत अपनी प्रडसद्ध पुस्तक "अनाशस्वि योग " की रचना की थी। अनाशस्वि आश्रम को गाूँधी आश्रम के नाम से भी जाना जाता है। यहां से डहमालय की बिज से ढकी चोडटयों को आसानी से देिा जा सकता है। आश्रम में महात्मा गाूँधी जी की एक मूडतज तथा उनके तीन बंदर भी साथ में है। इस आश्रम में पुस्तकालय ,प्राथजनाभवन और आवासीय भवन भी मौजूद है। यहां की िूबसूरती को देिकर ही उन्ोंने इसे स्विट्ज़रलैंड ऑफ़ इंडडया कहा था।
  5. Anashkati Asshram चाय के बागान -गाूँधी आश्रम से कु छ ही दू र चलने के बाद हम पहुंचे वहां के प्रडसद्ध चाय के बागान में। चारो और चाय के बागान थे,जो लगभग 200 हेियेर में िै ले हुए है। यहां पर डभन्न डभन्न प्रकार की चाय की पडत्तया उगाई जाती है। वहां पर हमने चाय की दू कान से कु छ जानकारी इसके बारे में ली। उन्ोंने हमे बताया डक यहां की प्रमुि चाय डगररयस टी है जो यहां मुख्य रूप से उगाई जाती है। इसके साथ ही यहां डबना डकसी के डमकल के चाय की िेती की जाती है। यहां की उगाई चाय डवदेशो तक में सप्लाई की जाती है। Tea Garden in Kausani शॉल िै िरी- चाय के बागान घूमने के बाद हम लोग वही पास में एक शाल िै िरी पहुंचे। उस िै िरी में जाने से पहले मैंने सोचा के शायद वहां बहुत बड़ी िै िरी होगी, परन्तु जैसे ही हम वहां पहुंचे तो वहां से कोई आवाज नहींआ रही थी सब शांत था। वहां के गॉडज ने बताया के आप नीचे
  6. जाईये वहां आप देि पाएं गे। हम नीचे उतर कर िै िरी में आ गए। उसके अंदर 3 लोग थे जो लकड़ी के बने ढांचों से शाल बना रहे थे। यह छोटी सी ििरी हथकरघा आयोग को बल देने के डलए तथा वहां के लोगो रोजगार देने के उद्देश्य से लगाई गयी थी। Shawl Factory पंत म्युडजयम - डहंदी जगत के महान कवी सुडमत्रा नंदन पंत को कौन नहीं जनता। पंत संग्राहलय उन्ी की स्मृडत में बनाया गया है। जहां आज यह संग्राहलय है वही पर पंत जी का बचपन गुजरा था। उनकी सभी कडवताओं की स्मृडतया आज भी इस पुुःतकालय में संजो कर रिी गयी है। Pant Mueseum कै से पहुंचे कौसानी -कौसानी जाने के डलए आप हवाई यात्रा कर के डनकट के एयरपोटज पंत नगर में आ सकते है। यहां से कौसानी की दुरी लगभग 180 KM है। पंत नगर से आप बस या टैक्सी से सीधे कौसानी जा सकते है। अगर आप रेलमागज से कौसानी आना चाहते है तो आपको बता दे के कौसानी जाने के डलए आप के वल काठगोदाम स्टेशन तक ही रेलमागज से आ सकते है। आगे की यात्रा आपको बस या टैक्सी से करनी पड़ेगी। काठगोदाम स्टेशन से कौसानी की दुरी 135 -150 KM लगभग है। सड़क मागज से आने के डलए रास्ते बहुत ही सुगम व् सुडवधाजनक है। डदल्ली से कौसानी की दुरी सड़कमागज द्वारा 400 KM के लगभग है। कौसानी घूमने का उडचत समय - कौसानी वैसे तो आप वर्जभर कभी भी जा सकते है। अगर आप बफ़ज बारी का आनंद उठाना कहते है तो आप डदसंबर से माचज के बीच कभी भी जा सकते है। यडद आप डहमालय की बिज से ढकी चोडटयों और यहां की हररयाली का आंनद लेना चाहते है तो आप माचज से जून के बीच में आ सकते है। गडमजयों में यहां पयजटकों की बहुत भीड़ होती है।
  7. कौसानी घूमने का अनुभव बहुत ही सुिमय रहा। वहां की िूबसूरती ने मेरा मन मोह डलया। सच में उसे स्विट्ज़रलैंड ऑफ़ इंडडया ऐसे ही नहींकहा गया। अगर आप इस बार कही घुमने का प्लान कर रहे है तो कौसानी ,बैजनाथ मंडदर अवश्य घूम कर आये। वाकई उत्तरािंड देवभूडम है,जाने का मन तो नहीं था परन्तु इंसान पररस्वस्तडथयों के आगे बेबस है। डिर पर जाने से से पहले िुद से वादा डकया था हमने इन् वाडदयों में जल्द ही वापस आएं गे। बस यही थी हमारी यात्रा। आशा करता हूँ मेरे द्वारा दी गयी जानकारी अच्छी लगी होगी। धन्यवाद डवडपन धीमान
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